कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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कलम बिना स्याही अधूरी है,
ठीक वैसे ही स्याही बिन कलम सूखी
अपने बच्चों से बड़ी दुश्मनी की,
किस लिए मैंने अंग्रेजी स्कूल में रख दिया।
अपने बच्चों को संस्कृति से दूर किया,
अपने बुढ़ापे का सहारा छिन गया
बेसहारा मुझे कर दिया
जो बच्चे दिल के बहुत करीब थे,
अंग्रेजी भाषा के कारण मुझे बेसहारा कर गए।
हिंदी को ठुकराया उसने,
अपने घर से निकाला मुझको
अपने बच्चों से बड़ी दुश्मनी की,
क्यों उनको हिंदी से दूर किया ?
मेरी आँखों का तारा थे वे,
आज उनकी नजरों की किरकिरी बन गई
उनको गर हिंदी पढ़ाई होती,
तो दिल में प्यार जगा देती।
मैंने देखी तुम्हारी बेरुखी,
मेरे बच्चे, क्यों देखी नहीं तुमने मेरी बेबसी!
बुढ़ापे की तस्वीर एक बेकसी की,
किस लिए मैंने बच्चों को हिंदी से दूर किया ?
हर भाषा पराई हुई, बच्चे दुश्मन, खुदाई हुई।
मुझको बड़ा अफसोस है हिंदी,
घर में क्यों नहीं सबको हिन्दी सिखाई…॥