डॉ. विद्या ‘सौम्य’
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)
************************************************
‘स्वागत, संकल्प, संघर्ष और सफलता’ (नववर्ष २०२६ विशेष)…
कैलेंडर के आखिरी पन्ने के साथ,
वह अपनी थकान का, एक और अध्याय मोड़ देती है
वह उन रातों को विदा कर, स्वागत करती है नूतन वर्ष का…
सुबह की सुनहरी किरणों का,
करती है अभिनंदन… शत-शत वंदन।
नया वर्ष उसके लिए कोई शोर नहीं,
एक गहरी, शांत झील की तरह है
जिसमें वह अपनी पुरानी परछाई को डुबोकर,
एक नई देह, एक नया मन धारण करती है,
संकल्प लेती है…
वह अब केवल ‘साया’ बनकर नहीं रहना चाहती,
वह चाहती है इस साल-
उसकी थाली में उसकी पसंद का स्वाद हो,
उसकी डायरी में उसके अपने संवाद हों
वह त्याग की उस वेदी को थोड़ा पीछे छोड़ देना चाहती है,
जहाँ उसकी पहचान केवल ‘रिश्तों’ की मोहताज थी
गहराई यह नहीं कि वह क्या पाएगी,
गहराई यह है कि वह इस साल क्या ‘छोड़’ आएगी…।
उसका संकल्पित मन…
संघर्ष की सीढ़ियों को रंगते हुए,
रुग्ण होती मानवता में करेगी, भावनाओं का विस्तार…
भूख से बिलबिलाते हर शुष्क चेहरे पर, बिखेरेगी पुष्पों-सी मुस्कान,
लुटाकर हृदय-समुद्र के अमूल्य रत्नों को
मिटा देगी तड़पती रूहों की प्यास।
नया साल महज तारीख़ नहीं, उसके भीतर की, उस आदिम, संघर्षरत स्त्री का जागना है…
जो सृजन भी करती है और विनाश भी,
जो प्रेम की कोमलता भी है और स्वाभिमान की आग भी
उसकी चूड़ियों की खनक में,अब इरादों की टंकार है,
उसके भीतर जो थमी नहीं, बस जीत की प्यास है
वह संघर्षों की आग में तपकर आई है,
वह बीते कल के काँटों को, पैरों तले मसलकर आई है
वह हवाओं के रुख को मोड़कर आई है,
वह श्रृंगार से विमुख और शक्ति से सिंचित
अपनी हथेली की लकीरों को और…
गाढ़ा कर आई है।
वह जलाएगी प्रेम का अलौकिक, अखंड दीप,
गाएगी स्वाभिमान का नव सुरभित राष्ट्रगीत
वह…
किस्मत के भरोसे नहीं, अपनी इच्छाशक्ति से
सपनों की चैतन्य स्याही से,
लिखेगी…।
स्वागत, संकल्प, संघर्ष और सफलता का,
एक नव्य संचरण गीत॥