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नदी पार की चिट्ठी

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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प्यार रहता हमारा नदी के पार,
चिट्ठी में रहता प्रेम का सार
करवट लेकर कटती रातें,
कैसे-कैसे बीती दिल की बातें
आँखें चार होती बड़े प्यार से,
कितने-कितने दिन देखे
नदी के इस पार आँखें
आज देंगे चिट्ठी नदी के उस पार जाकर।

आज आई रानी की चिट्ठी,
हर पंक्ति में प्रेम भरा था
प्रेम को मेरे समझो तुम रानी,
पढ़कर चिट्ठी मुझे तुम भूल ना जाना
पोस्टकार्ड में तुम देना जवाब।

प्रेम भरे अक्षर तुम लिखना,
आना एक बार तुम नदी के इस पार
पाँव में तेरे पायल पहनाऊँगा,
रानी घूमना छन-छन करती
आँगन के इस उस द्वारे रानी।

आना रानी एक दिन,
नदी के इस पार रानी
जोड़ देना प्यार के रंगीन तार तुम रानी।
कहाँ रहा वह अब जमाना,
नदी किनारे वाली बरसों पुरानी बात॥