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कीमती आजादी

राधा गोयल
नई दिल्ली
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“हमें बोलने की आजादी है। जीने की आजादी है।” कुछ बिगड़ैल लोग बोले।
एक छात्र- “किसने कहा, कि तुम्हें बोलने की आजादी नहीं है ? हमारे देश में संविधान में ही सभी को अभिव्यक्ति की आजादी है। सभी को जीने की आजादी है।”
“मानते हो ना इस बात को ?”
“बिल्कुल, लेकिन अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई। किसी को स्वेच्छाचारिता की आजादी नहीं है।मर्यादित जीवन जीने की आजादी है। ईश्वर ने तुम्हें २ हाथ दिए हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि तुम्हें किसी को धक्का देने का अधिकार मिल जाता है। हाँ, तुम इस बात के लिए आजाद हो कि गिरते हुए को सहारा दो। लोगों के जीने का सम्बल बनो। खुद भी जियो, औरों को भी जीने दो। किसी को मारने की आजादी तुम्हें नहीं है। किसी पर अभद्र टिप्पणी करने की आजादी नहीं है। किसी महिला का शील भंग करने की आजादी नहीं है।”
“तो कौन-सी आजादी है ?”
“खाने पीने, गाने, नाचने, अपने शौक पूरे करने की आजादी है। देश को बुलंदियों पर पहुँचाने की आजादी है। शत्रु से दो-दो हाथ करके उसके दाँत खट्टे करने की पूरी आजादी है, मगर शत्रु के साथ षड्यंत्र करके देश के विरुद्ध जालसाजी की आजादी बिल्कुल नहीं मिल सकती। छुट्टा साण्ड बनकर घूमने की आजादी नहीं मिल सकती। मस्तमौला बन कर जीने की आजादी तो मिल सकती है, किंतु किसी को गलत निगाहों से देखने की आजादी नहीं मिल सकती।
वैसे एक बात बताओ। क्या आजादी का मतलब जानते हो ?”
“हाँआआआआ- १५ अगस्त को हमारा देश आजाद हुआ था। हमें अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली थी।”
“तुम इसे आजादी कहते हो ? क्या तुम वास्तव में आजाद हुए हो ? अरे तुम तो मानसिक रूप से अभी भी गुलाम हो। आज भी गुलामों की भाषा बोलते हो। फिर किस मुँह से कह सकते हो कि तुम्हें आजादी मिली ? तुम्हें शायद यह भी नहीं मालूम, कि हमें इस आजादी की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी और किन शर्तों पर आजादी मिली।”
सबके सिर शर्म से झुक गए।