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स्वर्ग से सुंदर

डाॅ. मधुकर राव लारोकर ‘मधुर’ 
नागपुर(महाराष्ट्र)

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स्वर्ग से सुंदर है,ये जीवन,
हँसी भी,खुशी से मिलती बेइंतिहा
कभी रंजो गम से,भरी ये दास्ताँ,
अपनों का साथ भी,जैसे धूप-छाँव
दुश्मनी नहीं फक़त,दोस्ती की दास्ताँ॥
स्वर्ग से सुंदर है ये धरती,
कहीं पेड़ पौधे,कहीं फूलों की महक
बर्फ से आच्छादित,कहीं है पहाड़
कहीं कल-कल बहती,नदी की धारा,
उद्वेलित मन शांत करती,सावन की फुहार॥
स्वर्ग से सुंदर है यहाँ इंसानियत,
किसी आँखों से बहते आँसू,
मन को दुखी कर जाते
इंसा किसी के काम,आने के लिए,
खुद से अपना,सब लुटा जाते।
स्वर्ग से सुंदर है,यहाँ अपनापन,
एक-दूजे से,घुल-मिल जाते
नहीं अपने-पराए का,कोई भेद यहाँ,
दुश्मन की गलती पर भी माफ
कर,सबको अपना बनाते यहाँ।
स्वर्ग से सुंदर है,परिवार अपना,
रहते शांति से,झोपड़ी में सभी
हिलमिल कर,प्यार मोहब्बत से।
स्वर्ग में देवता,भोग विलास करते,
घरवाले कर्मवीर बन,जीते शान से॥

परिचय-डाॅ. मधुकर राव लारोकर का साहित्यिक उपनाम-मधुर है। जन्म तारीख़ १२ जुलाई १९५४ एवं स्थान-दुर्ग (छत्तीसगढ़) है। आपका स्थायी व वर्तमान निवास नागपुर (महाराष्ट्र)है। हिन्दी,अंग्रेजी,मराठी सहित उर्दू भाषा का ज्ञान रखने वाले डाॅ. लारोकर का कार्यक्षेत्र बैंक(वरिष्ठ प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त)रहा है। सामाजिक गतिविधि में आप लेखक और पत्रकार संगठन दिल्ली की बेंगलोर इकाई में उपाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-पद्य है। प्रकाशन के तहत आपके खाते में ‘पसीने की महक’ (काव्य संग्रह -१९९८) सहित ‘भारत के कलमकार’ (साझा काव्य संग्रह) एवं ‘काव्य चेतना’ (साझा काव्य संग्रह) है। विविध पत्र-पत्रिकाओं में आपकी लेखनी को स्थान मिला है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में मुंबई से लिटरेरी कर्नल(२०१९) है। ब्लॉग पर भी सक्रियता दिखाने वाले ‘मधुर’ की विशेष उपलब्धि-१९७५ में माउंट एवरेस्ट पर आरोहण(मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व) है। लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी की साहित्य सेवा है। पसंदीदा लेखक-मुंशी प्रेमचंद है। इनके लिए प्रेरणापुंज-विदर्भ हिन्दी साहित्य सम्मेलन(नागपुर)और साहित्य संगम, (बेंगलोर)है। एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बी. एड.,आयुर्वेद रत्न और एल.एल.बी. शिक्षित डाॅ. मधुकर राव की विशेषज्ञता-हिन्दी निबंध की है। अखिल भारतीय स्तर पर अनेक पुरस्कार। देश और हिन्दी भाषा के प्रति विचार-
“हिन्दी है काश्मीर से कन्याकुमारी,
तक कामकाज की भाषा।
धड़कन है भारतीयों की हिन्दी,
कब बनेगी संविधान की राष्ट्रभाषा॥”