गौरवपूर्ण पहचान के रूप में अपनाएं हिन्दी को

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)************************************ भारत ऐसा देश है, जहाँ हर कुछ किलोमीटर के बाद भाषा और बोली बदल जाती है। यह हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भाषाई विविधता का प्रमाण है। बहुत पुरानी कहावत है- “कोस कोस पर पानी बदले, पाँच कोस पर बानी।”हिंदी हमारे स्वाभिमान और गर्व की भाषा है। यह पूरे विश्व में बोली … Read more

‘नवरंग’ का गीत-संगीत आज भी सतरंगी

हरिहर सिंह चौहानइन्दौर (मध्यप्रदेश )************************************ सन १९५९ में प्रदर्शित हिंदी फिल्म ‘नवरंग’ के गीत और संगीत आज इतने वर्षों बाद भी दिल को छू लेता है। बहुत सुकुन देने वाली धुनें हैं, फिल्म का संगीत अपने-आपमें बहुत ही कर्णप्रिय था। संध्या व वी. शांताराम और संगीतकार सी. रामचंद्र ने जो सुर और ताल के साथ … Read more

सृष्टि बचाने के लिए संयुक्त परिवार आवश्यक

ममता तिवारी ‘ममता’जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)******************************************* बहुत पीछे न जाते हुए यदि मैं अपनी ही बात करूँ तो हर घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, ताई-ताया, बुआ, माता-पिता के साथ अपने भाई-बहन और चाचा-ताया के बच्चे प्रायः एक छोटे से परिवार में संयुक्त रहते थे। जब माता-पिता स्वयं दादा-दादी बन जाते और दादा-दादी परलोक गमन कर जाते, तब बंटवारा होता … Read more

समय है कि आतिशबाज़ी रहित त्योहार गढ़ें

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** पर्यावरण संकट हमारे समय की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। बढ़ता प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की लगातार हो रही क्षति ने जीवन को असहज और असुरक्षित बना दिया है। यह संकट किसी दूर के भविष्य की चिंता नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित कर रहा है। राजधानी … Read more

सुरमयी संध्या तले

संजीव एस. आहिरेनाशिक (महाराष्ट्र)********************************************* धीरे-धीरे संध्या बिल्ली के कदमों से कब जमीं पर उतर आई, पता ही नहीं चला। दूर पश्चिम की देहरी पर कुछ सिंदूरी बादल अभी भी रेंग रहे हैं। सूरज के पदचिन्ह संजोते क्षितिज अभी भी अपना रंग धारण किए हुए है। दूर-दूर तक फैली मक्का, बाजरा, सोयाबीन के विस्तीर्ण फैले खेतों … Read more

आम के आम और गुठलियों के दाम

राधा गोयलनई दिल्ली****************************************** इसका अर्थ है किसी वस्तु से २ तरह के फायदे लेना यानी आम खाने का फायदा और उसकी गुठलियों को बेकार न समझकर उससे भी कुछ कमाई करना। यानी दोहरा लाभ कमाना। आज कूड़े का निस्तारण एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। निरंतर कूड़े के पहाड़ खड़े हो रहे हैं। ऊपर … Read more

अनिश्चित भविष्य से दुःखी युवाओं की चिंता करें सरकार

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** पिछले कुछ दशकों तक यह मान्यता रही कि जीवन की मध्य आयु वर्ग (४०-५० वर्ष) के लोग ही सबसे अधिक अवसादग्रस्त, तनावग्रस्त, क्रोधित और दुखी होते हैं। युवावस्था और बुजुर्गावस्था अपेक्षाकृत अधिक प्रसन्न और संतुलित मानी जाती थी, लेकिन हाल के वैश्विक अध्ययनों ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। … Read more

हिंदी राष्ट्रभाषा: चुनौतियाँ हैं, पर सूरज निकलेगा

पद्मा अग्रवालबैंगलोर (कर्नाटक)************************************ आज से ७ दशक पूर्व १४ सितंबर १९४९ को हिंदी भाषा को संविधान की राजभाषा के रूप में स्वीकृत किया गया… उसी दिन की स्मृति में पूरे देश में ‘हिंदी दिवस’ और ‘हिंदी पखवाड़ा’ मनाया जाता है, जिसमें प्रत्येक वर्ष हिंदी के उत्थान के विषय में बड़ी-बड़ी कार्यशाला और भाषण प्रतियोगिता आदि … Read more

प्रकृति की नाराजगी समझिए, वरना…

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** प्रकृति अपनी उदारता में जितनी समृद्ध है, अपनी प्रतिशोधी प्रवृत्ति में उतनी ही कठोर है। जब तक मनुष्य उसके साथ ताल-मेल में रहता है, तब तक वह जल, जंगल और जमीन के रूप में वरदान देती है, लेकिन जैसे ही मनुष्य अपनी स्वार्थपूर्ण महत्वाकांक्षाओं और तथाकथित आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में … Read more

‘विक्रम’ से हौसलों की उड़ान भरता भारत

ललित गर्ग दिल्ली*********************************** भारत ने तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक नया इतिहास रचते हुए अपना पहला पूर्णतया स्वदेशी ३२-बिट माइक्रो प्रोसेसर तैयार कर एक तकनीकी क्रांति को आकार दिया है। यह उपलब्धि न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि राष्ट्रीय गौरव का भी प्रतीक है। भारत ने इस तकनीकी क्रांति की तरफ कदम … Read more