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सर्वसमावेशी बन गया है डॉ.भागवत का हिंदुत्व भी

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुसलमानों के प्रति आजकल रवैया क्या है,इस प्रश्न पर बहस चल पड़ी है। बहस का मुख्य कारण संघ के मुखिया डॉ.मोहन भागवत के कुछ बयान हैं। अभी उन्होंने कहा है कि दुनिया में सबसे ज्यादा संतुष्ट कोई मुसलमान है तो वह भारत का मुसलमान है। पिछले साल उन्होंने अपने विज्ञान भवन के भाषण में कहा था कि हिंद में जो भी पैदा हुआ है,वह हिंदू है। भारत के मुसलमान भी हिंदुत्व के दायरे से बाहर नहीं हैं। उन्होंने माना कि ‘हिंदू’ शब्द हमें विदेशियों (मुसलमानों) ने दिया है,लेकिन अब वह हमसे चिपक गया है।
भारत के मुसलमान दुनिया में सबसे संतुष्ट हैं,यह बात कोई बड़े मुल्ला-मौलवी या कोई नामी-गिरामी मुस्लिम नेता कह देते तो बेहतर होता,और उनके खिलाफ काफिराना हरकत के फतवे जारी हो जाते,लेकिन संघ और डॉ. भागवत के उक्त बयानों से भी कुछ मुस्लिम नेता खुश नहीं हैं। उनका मानना है कि जब से केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी है,देश के मुसलमानों पर बड़ा अत्याचार हो रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तो यहां तक कह दिया कि भारत तो अब हिटलर का जर्मनी बन रहा है। यहूदियों पर हिटलर जो जुल्म करता था,वे अब भारत के मुसलमानों पर हो रहे हैं।
जाहिर है कि,मुसीबतों में फंसे पाकिस्तान के नेता भारत पर ये इल्जाम इसलिए भी लगाते हैं कि उनके मत वहां पक्के हो जाएं लेेकिन हमारे मुस्लिम नेताओं को वैसे आरोप लगाते समय कुछ मुद्दों पर जरुर ध्यान देना चाहिए। सबसे पहले तो यह कि पिछले पांच-छह साल में मुसलमानों के साथ यहां-वहां जैसी भी हिंसा और जोर-जबर्दस्ती हुई है,वैसी क्या बरसों-बरस तक कांग्रेसी राज में नहीं होती रही है ? यह किसी दल-विशेष का मसला नहीं है,यह भारतीय समाज के आंतरिक अंतर्विरोधों का परिणाम है।
भारत के मुसलमान कौन हैं ? क्या ये अरब हैं, मंगोल हैं,तुर्क हैं,मुगल हैं,उइगर हैं ? हजार-पांच सौ साल पहले ये विदेशी अल्प संख्या में भारत जरुर आए थे,लेकिन अब तो वे इतने घुल-मिल गए हैं कि उनका घराना-ठिकाना ही खोजना मुश्किल है। इन मुट्ठीभर विदेशियों के कारण क्या हमारे करोड़ों मुसलमानों को हम विदेशी मूल के कह सकते हैं ? इस प्रश्न का जवाब अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में देना चाहूंगा। उन्होंने कहा था कि भारत के मुसलमानों का खून,हमारा खून है और उनकी हड्डियां, हमारी हड्डियां हैं।
कुछ वर्ष पहले मैंने कहा कि भारत के मुसलमान दुनिया के सर्वश्रेष्ठ मुसलमान हैं तो कई अरब शेखों के चेहरों पर अचानक तनाव आ गया। उन्हें बताना पड़ा कि ऐसा इसलिए है कि भारत के मुसलमानों ने इस्लाम की नई विचारधारा को कबूल तो किया लेकिन उनकी नसों में हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति भी प्रवाहित होती है। दोनों का सम्मिश्रण ही उन्हें सर्वश्रेष्ठ बनाता है।
भारत का मुसलमान सर्वश्रेष्ठ तो है ही,वह निश्चित रुप से उन देशों के मुसलमानों से कहीं बेहतर हालात में हैं,जहां वह अल्पसंख्यक है। हमारे मुसलमानों की तुलना जरा उन देशों से कीजिए,जो ईसाई हैं,बौद्ध हैं,यहूदी हैं और कम्युनिस्ट हैं। सुन्नी देशों में शिया और शिया देशों में सुन्नी मुसलमानों की दशा क्या है ? पाकिस्तान में तो वे एक-दूसरे पर भयंकर हिंसक हमले करते ही रहते हैं। मुसलमानों में अहमदिया,कादियानी,मेहदी,बलूच,सिंधी और पंजाबी आदि एक-दूसरे पर शोषण और जुल्म के इल्जाम लगाते रहते हैं। यदि बंगाली मुसलमानों पर जुल्म नहीं हो रहा होता तो क्या बांग्लादेश बनता ? पाकिस्तान में हिंदुओं,सिखों और ईसाइयों की जो हालत है,क्या भारत में मुसलमानों की भी वही हालत है ? क्या मुस्लिम देश में कोई गैर-मुस्लिम कभी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बना है ? भारत में विधायक और सांसद ही नहीं,मंत्री,मुख्यमंत्री और राज्यपाल ही नहीं,भारत के राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति भी कई मुसलमान बने हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि भारत का प्रधानमंत्री भी कभी कोई मुसलमान बन जाए।
पिछले वर्षों में ऐसे दर्जनों ईसाई,बौद्ध और कम्युनिस्ट देशों में मैं रहा और घूमा हूँ,जहां मुसलमान हैं तो सही,लेकिन भारत की तरह अल्प संख्या में हैं। सत्य तो यह है कि वे जहां भी अल्प संख्या में हैं,उनका जीना दूभर है। सोवियत संघ के उजबेक,ताजिक,किरगीज़, कजाक और तुर्कमान लोगों को रुसियों की गुलामी करते हुए देखा है। चीन के शिनच्यांग प्रांत के उइगर मुसलमानों की दशा देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। फ्रांस के अल्जीरियाई और अफ्रीकी मुसलमानों के इस्लामी रहन-सहन और पहनावे पर तरह-तरह के प्रतिबंध हैं। इस्राइल में मुस्लिम फलस्तीनियों का क्या हाल है,सारी दुनिया जानती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि भारत के मुसलमान सउदी अरब के मुसलमानों की तरह मालदार और ताकतवर हैं। वे वैसे हो ही नहीं सकते थे,क्योंकि भारत में ज्यादातर वे ही लोग मुसलमान बने,जो गरीब,ग्रामीण,अशिक्षित, मेहनतकश और कमजोर थे। वही धारावाहिकता आज भी कायम है। उनसे भी ज्यादा बदहाल वे हिंदू हैं,जो दलित हैं, आदिवासी हैं,पिछड़े हैं,मेहनतकश हैं। मुसलमानों की हालत भारत में कहीं बेहतर है,क्योंकि भारत की संस्कृति सहनशीलता पर आधारित है। इस्लाम से भी अधिक कट्टरपंथी संप्रदाय हिंदुओं में हैं,लेकिन उन्हें भी बर्दाश्त किया जाता है। एतराज तभी होता है,जब मजहब को राजनीति का आधार बनाया जाता है,जैसा मोहम्मद अली जिन्ना ने बनाया था। जिन्ना का मुँहतोड़ जवाब सावरकर और गोलवलकर थे। अब देश- काल बदल गया है, इसीलिए डॉ. भागवत का हिंदुत्व भी सर्वसमावेशी बन गया है। डॉ. भागवत ने पुरानी लकीर काटी नहीं है,बस,एक बड़ी लकीर खींच दी है।

परिचय– डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।

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