मुकेश इन्दौरी
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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कृतिकार सुधा वर्मा की कृति 'मेरी डायरी' (यादों का दस्तावेज) लेखिका की बचपन की यादों से लेकर आधुनिक सामाजिक मुद्दों तक का एक विस्तृत दस्तावेज है। इसमें १९६०-७० के दशक के रायपुर और आज के युग की तुलना की गई है।

◾प्रमुख मुद्दे:
🔹पारिवारिक और नैतिक मूल्य-
लेखिका अपनी माँ को ‘प्रथम गुरु’ मानती हैं और उनसे मिले संस्कारों का उल्लेख करती हैं।
🔹सामाजिक चिंताएँ-
समाज में बढ़ती संवेदनहीनता, अपराध (जैसे बलात्कार) और लुप्त होते तीज-त्योहारों पर गहरा प्रहार किया गया है।
🔹प्रकृति और मनोविज्ञान-
इसमें पर्यावरण संरक्षण, ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और ‘ग्रोथ माइंडसेट’ जैसे विषयों को भी शामिल किया गया है।
◾लेखन शैली और भाषा:
पुस्तक की भाषा अत्यंत सरल और हृदयस्पर्शी है, जिसमें छत्तीसगढ़ी परिवेश के स्थानीय शब्दों (जैसे बोरे बासी, छानही) का सुंदर प्रयोग हुआ है।
लेखिका ने निर्जीव वस्तुओं के साथ काल्पनिक संवाद के माध्यम से अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से रखा है। मानवीय सम्बंधों की व्याख्या करते हुए उन्होंने पुरुष के प्रेम की तुलना ‘नारियल’ (बाहर से कठोर, भीतर से कोमल) से की है।
◾साहित्यिक महत्व:
साहित्यिक दृष्टि से यह कृति संस्मरण, निबंध और डायरी विधा का एक अनूठा संगम है, जो पाठकों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है। लेखिका के अनुसार, “अब यह डायरी उनकी निजी संपत्ति न होकर पाठकों की हो चुकी है।”
यह कृति समाज को आईना दिखाने के साथ-साथ अपनी जड़ों (संस्कृति और संस्कारों) से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है। इसकी प्रासंगिकता इसके समसामयिक विषयों और भावनात्मक ईमानदारी में निहित है।