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जो मेरे प्रेम को समझा नहीं…

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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जो मेरे प्रेम को नहीं समझा,
मैं भी उससे प्रेम करना नहीं चाहती।

कभी मुझे अपना समझो तो ठीक है,
बंदिशों में रिश्ते निभाना नहीं चाहती।

मेरी मंज़िल तो बस एक है,
जिसको मैंने सपनों में देखा था कभी।

खड़ी थी समंदर किनारे पर,
नदियों ने अपना प्रेम जताया मुझे।

भटकती रही शान्ति के लिए,
हर जगह अशांति फैली हुई है मगर।

हर जीत के बाद शान्ति चाहिए,
जीत मिलती है प्रेम के भाव से।

प्रेम जबसे हुआ दवा काम आती नहीं,
प्रेम में समर्पण ही तो बस एक दवा काम आती।

लोग मिलते रहे, मशवरा देते रहे,
दिल किसी का भी मैंने नहीं तोड़ा कभी।

आप मेरी कमी को देखते रह गए,
देखिए तो कभी मेरी मुस्कान को।

दूर हूँ आपसे मैं मगर,
दिल में मेरे आप रहते सदा।

दिल की राहों में फूल बिछा रखे हैं,
बस पाँवों से कुचल कर आना नहीं।

मेरे दिल में प्रेम ही प्रेम भरा है यहाँ,
दिल में प्रेम के दिए अब तक जलते रहे।

मैं बस इतना ही चाहती हूँ प्रिय,
कभी पास आना चाहता ही नहीं।

पास आने से भी अब क्या फायदा,
दिल में तो बस तुम ही रहते सदा॥