कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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हम अक्सर महसूस नहीं करते हैं, पर तारीफ़ में भी अहंकार छिपा होता है। हम अक्सर यह सोच कर खुश हो जाते हैं कि हमें तारीफ मिली है, पर हर तारीफ अच्छी तारीफ नहीं होती। उसके पीछे कहीं न कहीं एक झूठ छिपा होता है। तारीफ सुनने की चाहत कहीं न कहीं एक गंभीर बीमारी है, या कहें यह इन्सान को मानसिक रोगी बना कर रख देती है।
मैंने आज महसूस किया- एक १३ साल की बच्ची को जब पढ़ने के लिए डांटा जाता है, तब वह और ज्यादा आक्रोशित हो जाती है। यदि उसे टोका-टाकी मिलती है, तब वह कानून की भी धमकी दे देती है । जिस बच्चे को बचपन से प्यार, सराहना या कहें हर समय तारीफ सुनने की चाहत होती है, उसी को बढ़ती उम्र में टोका-या किसी ज्यादा ग़लत व्यवहार पर भी कहा तो फिर वह अपना आपा खो बैठती है
हर बढ़ते बच्चे की प्रवृत्ति होती है कि वह आजादी चाहते हैं।
माता-पिता की रोक-टोक उन्हें पसंद नहीं। यह भी होता है ऐसे बच्चे अपने गुरू या बाहर होस्टल में रहने बाले बच्चे तो अपने साथी को भी पसंद नहीं करतेहैं ।
ऐसी अवस्था में बच्चे भी अपनी सोच या कहें मन से बहुत ज्यादा लड़ाई कर रहे होते हैं, उनमें यह बदलाव उन्हें खुद अच्छा नहीं लगता है और न ही वह यह सब समझ पाते हैं। उन्हें डांटा भी नहीं जा सकता है, क्योंकि बच्चे और उग्र हो जाते हैं।इसे तो बस एक छोटी-सी तारीफ के शब्द ही ठीक कर सकते हैं। जैसे- “बेटा तुम पहले से भी ज्यादा समझदार हो गई हो,/हो गए हो,
बहुत ज्यादा अच्छा पढ़ रहे हो, लेकिन और ज्यादा पढ़ो।”
अगर हम बड़े भी नहीं समझे, तो फिर बच्चों में मानसिक रोग होना तय है। ऐसे में बच्चे मन ही मन दुखी हो जाते हैं। ऐसे में किसी बड़े अंजाम को भी जन्म देते हैं। इसी लिए उन्हें प्यार और सम्मान देना चाहिए, क्योंकि उनके अन्दर तारीफ सुनने का अहंकार उनका ही दुश्मन बन कर छिपा बैठा होता है। यह अहंकार बहुत ज्यादा खतरनाक होता है। आजकल यह अहंकार बहुत से लोगों के अन्दर उनका ही दुश्मन बन कर बैठा है।
हम अक्सर किसी से अपनी शिकायत सुन कर दुखी हो जाते हैं, रोते हैं या अलग-थलग रहते हैं। दरअसल, यह तारीफ का अहंकार है। इसे अपने जीवन से बहुत जल्दी दूर भगाएं। हम तो यही कहेंगे-
जो जिन्दा होते हैं, उन्हीं की निन्दा होती है।
हर सिक्के के ही दो पहलू नहीं, मनुष्य के भी दो पहलू होते हैं।
जीवन की बस एक पहचान-
जो व्यस्त हैं, वही मस्त है।
स्वस्थ रहें, खुश रहें और हरदम व्यस्त रहें।