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त्याग, तप और तेज का पर्याय ‘वीर सावरकर’

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें आदरपूर्वक ‘वीर सावरकर’ कहा जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अग्रदूतों में थे; जिनकी लेखनी और कर्म दोनों में अदम्य राष्ट्रप्रेम धधकता था। उनका जन्म २८ मई १८८३ को महाराष्ट्र के भगूर ग्राम में हुआ। बाल्यावस्था से ही उनमें स्वाधीनता की ज्वाला प्रज्वलित थी। उन्होंने युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने हेतु ‘अभिनव भारत’ नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की।
श्री सावरकर उच्च शिक्षा के लिए लंदन गए, जहाँ उन्होंने ‘इंडिया हाउस’ में रहकर क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन किया। वहीं उन्होंने १८५७ के संग्राम को ‘भारत का प्रथम स्वतंत्रता समर’ सिद्ध करते हुए एक ऐतिहासिक ग्रंथ की रचना की। यह पुस्तक अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध एक वैचारिक शस्त्र बन गई। उनके लेखन में ओज, तर्क और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत समन्वय था।
१९०९ में क्रांतिकारी गतिविधियों के आरोप में उन्हें गिरफ़्तार कर भारत लाया गया। मार्ग में मार्सेय (फ्रांस) के बंदरगाह पर समुद्र में कूदकर भागने का उनका साहसिक प्रयास इतिहास में अद्वितीय है। अंततः, उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा देकर अंडमान की सेल्युलर जेल में भेजा गया। वहाँ की अमानवीय यातनाएँ भी उनके मनोबल को विचलित न कर सकीं। कोल्हू में तेल पेरते हुए कालकोठरी के अंधकारमय एकांत में भी वे कविता और चिंतन द्वारा राष्ट्रप्रेम की ज्योति जलाते रहे।
वीर सावरकर केवल क्रांतिकारी ही नहीं, प्रखर चिंतक और समाज-सुधारक भी थे। उन्होंने अस्पृश्यता के विरोध में आवाज़ उठाई और हिंदू समाज में समरसता का आह्वान किया। उनका ‘हिंदुत्व’ संबंधी चिंतन सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा पर आधारित था, जिसमें भारत को एक प्राचीन सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया।
स्वतंत्रता के बाद भी उनका जीवन संघर्षमय रहा, किंतु राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा अक्षुण्ण रही। २६ फरवरी १९६६ को उन्होंने देह का त्याग किया। उनका जीवन त्याग, तप और तेज का पर्याय है। वीर सावरकर भारतीय इतिहास के उन दीप्त स्तंभों में हैं, जिनकी स्मृति आने वाली पीढ़ियों को साहस, स्वाभिमान और राष्ट्रभक्ति का संदेश देती रहेगी।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥