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हम सामाजिक उत्तरदायित्व भूलते जा रहे ?

पूनम चतुर्वेदी शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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भारत स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है। हमारी सांस्कृतिक परंपरा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे आदर्शों पर आधारित रही है। परिवार, पड़ोस, ग्राम सभा और समुदाय-ये केवल सामाजिक इकाइयाँ नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की जीवित संरचनाएँ थीं, परंतु पिछले कुछ वर्षों की अनेक घटनाएँ और उपलब्ध आँकड़े संकेत देते हैं कि सामाजिक उत्तरदायित्व का ताना-बाना कमजोर हो रहा है। प्रश्न यह है, कि क्या हम एक जिम्मेदार समाज के रूप में अपने कर्तव्यों से विमुख होते जा रहे हैं ? इस प्रश्न का उत्तर भावनात्मक नहीं, बल्कि तथ्यों और आँकड़ों के आधार पर तलाशना आवश्यक है। भारत सरकार के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीन रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष २०२२ में कुल ४, ४५, २५६ आत्महत्या के मामले दर्ज हुए। यह संख्या पिछले वर्षों की तुलना में वृद्धि दर्शाती है। आत्महत्या करने वालों में बड़ी संख्या १८-३० वर्ष आयु वर्ग की है। यह केवल मानसिक स्वास्थ्य का संकट नहीं, बल्कि सामाजिक समर्थन तंत्र की कमजोरी का संकेत भी है। यदि परिवार, मित्र और समुदाय व्यक्ति की पीड़ा को समय रहते समझ पाते, तो क्या इन संख्याओं में कमी संभव नहीं थी ?
महिलाओं और बच्चों के संदर्भ में यह स्थिति और भी चिंताजनक है।रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष २०२२ में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के ४ लाख से अधिक मामले दर्ज हुए। घरेलू हिंसा, दहेज मृत्यु, उत्पीड़न और यौन अपराधों की संख्या यह दर्शाती है कि घर, जो सुरक्षा का स्थान होना चाहिए, अनेक बार हिंसा का स्थल बन जाता है। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं; यह सामाजिक मानसिकता और उत्तरदायित्व का प्रश्न है। जब पड़ोस, रिश्तेदार या समुदाय हिंसा को ‘परिवार का निजी मामला’ कहकर अनदेखा कर देते हैं, तब समाज की सामूहिक जिम्मेदारी विफल होती है।
बाल अपराध और बाल संरक्षण के क्षेत्र में भी स्थिति गंभीर है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और विभिन्न राज्य सरकारों की रिपोर्टें बताती हैं कि बाल विवाह, बाल श्रम और बाल यौन शोषण जैसी समस्याएँ अब भी व्यापक हैं। ‘पॉक्सो’ अधिनियम के अंतर्गत दर्ज मामलों की संख्या हर वर्ष हजारों में है। यह बताता है कि बच्चे सुरक्षित वातावरण से वंचित हैं। यदि विद्यालय, परिवार और समुदाय मिलकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करें, तो ऐसे मामलों में कमी लाई जा सकती है।
डिजिटल युग में सामाजिक उत्तरदायित्व की नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और विभिन्न शोध संस्थानों की रिपोर्टों के अनुसार इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या ८० करोड़ से अधिक हो चुकी है। डिजिटल पहुँच ने अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन साइबर बुलिंग, भ्रामक समाचार और ऑनलाइन उत्पीड़न की घटनाएँ भी बढ़ी हैं। ब्यूरो की साइबर अपराध रिपोर्ट के अनुसार २०२२ में ६५ हजार से अधिक साइबर अपराध दर्ज हुए। इनमें महिलाओं और किशोरियों को लक्षित अपराधों की संख्या उल्लेखनीय है। यह बताता है कि डिजिटल नागरिकता की नैतिकता अभी विकसित नहीं हो पाई है।
पर्यावरण के क्षेत्र में भी सामाजिक जिम्मेदारी की परीक्षा हो रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों के अनुसार देश के अनेक शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है। दिल्ली-एनसीआर, कानपुर, लखनऊ जैसे शहरों में प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से कई गुना अधिक दर्ज किया गया है। यह केवल औद्योगिक नीति का परिणाम नहीं; यह नागरिक व्यवहार, सार्वजनिक परिवहन के उपयोग, कचरा प्रबंधन और ऊर्जा उपभोग से भी जुड़ा है। जब हम व्यक्तिगत सुविधा को सामूहिक स्वास्थ्य से ऊपर रखते हैं, तब समाज की जिम्मेदारी कमजोर पड़ती है।
स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में कोविड-१९ महामारी ने हमें सामूहिक उत्तरदायित्व का महत्व सिखाया। भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार महामारी के दौरान लाखों लोगों ने स्वयंसेवा, सामुदायिक रसोई और राहत कार्यों में योगदान दिया। यह सकारात्मक उदाहरण था, किंतु ऑक्सीजन और दवाओं की कालाबाजारी, फर्जी सूचनाओं का प्रसार और अस्पतालों में अव्यवस्था भी सामने आई। संकट के समय समाज का एक हिस्सा सहयोग में आगे आया, तो दूसरा हिस्सा अवसरवादिता में उलझा रहा। यह द्वंद्व हमारी सामूहिक नैतिकता को प्रश्नों के घेरे में खड़ा करता है।
ऐसे ही शिक्षा के क्षेत्र में भी सामाजिक असमानता स्पष्ट है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० के दस्तावेज़ और यूडीआईएसई+ के आँकड़े बताते हैं कि माध्यमिक स्तर पर ड्रॉप-आउट दर अभी भी चिंता का विषय है, विशेषकर बालिकाओं में। आर्थिक कारण, सामाजिक दबाव और बाल विवाह जैसी समस्याएँ पढ़ाई में बाधा बनती हैं। यदि समुदाय, पंचायत और अभिभावक मिलकर शिक्षा को प्राथमिकता दें, तो यह दर घटाई जा सकती है। शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं; यह सामाजिक विकास का आधार है।
सामाजिक उत्तरदायित्व का एक और आयाम है-वृद्धजन की स्थिति। सामाजिक न्याय मंत्रालय की रिपोर्टों के अनुसार वृद्धजन आबादी लगातार बढ़ रही है। अनेक वृद्ध अकेले रह रहे हैं या उपेक्षा का सामना कर रहे हैं। वृद्धाश्रमों की संख्या में वृद्धि यह संकेत देती है, कि संयुक्त परिवार की संरचना कमजोर हुई है। यदि समाज अपने बुजुर्गों को सम्मान और देखभाल नहीं दे पाता, तो यह सांस्कृतिक मूल्यों के क्षरण का संकेत है।
हालाँकि, यह तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। अनेक स्वयंसेवी संगठन, महिला समूह, युवा क्लब और सामुदायिक पहलें सकारात्मक बदलाव ला रही हैं। स्वच्छ भारत मिशन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं में सामुदायिक सहभागिता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कई राज्यों में स्वयं सहायता समूहों ने महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त किया है। यह दर्शाता है, कि जब समाज जागरूक होता है, तो परिवर्तन संभव है।
फिर भी मूल प्रश्न बना रहता है, कि- क्या हम व्यक्तिगत उपलब्धि की दौड़ में सामूहिक जिम्मेदारी भूलते जा रहे हैं ? समाज केवल कानून और नीतियों से नहीं चलता, वह नैतिक चेतना से चलता है। यदि हम सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को अनदेखा करते हैं, घरेलू हिंसा को निजी मामला कहकर चुप रहते हैं, या पर्यावरणीय नियमों को व्यक्तिगत असुविधा मानते हैं, तो हम अनजाने में सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करते हैं।
सामाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ केवल दान या स्वयंसेवा नहीं है। यह रोज़मर्रा के आचरण में झलकता है- सत्य बोलना, नियमों का पालन करना, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना, और जरूरतमंद की सहायता करना। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नागरिक शास्त्र केवल पाठ्यक्रम न रहे, बल्कि व्यवहार का हिस्सा बने। मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म सकारात्मक उदाहरणों को प्रोत्साहित करें। परिवार संवाद का वातावरण बनाए।
आज आवश्यकता है, कि हम अपने भीतर झाँकें और पूछें- क्या हम केवल अधिकारों की बात कर रहे हैं, या कर्तव्यों को भी उतना ही महत्व दे रहे हैं ? भारतीय संविधान के अनुच्छेद ५१-ए में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख है, परंतु कितने नागरिक इन कर्तव्यों को व्यवहार में उतारते हैं ? यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाए, तो अपराध, प्रदूषण, असमानता और हिंसा जैसी समस्याएँ स्वतः कम हो सकती हैं।

अंततः, एक जिम्मेदार समाज बनने के लिए न तो किसी एक सरकार की आवश्यकता है और न ही किसी एक संस्था की। यह सामूहिक चेतना का परिणाम है। हमें अपने परिवार, पड़ोस, विद्यालय और कार्यस्थल से शुरुआत करनी होगी। जब हम दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझने लगेंगे, तब सामाजिक उत्तरदायित्व केवल शब्द नहीं रहेगा;वह जीवन का हिस्सा बन जाएगा, क्योंकि समाज का भविष्य नागरिकों की संवेदना से तय होता है। यदि हम संवेदनशील, जागरूक और उत्तरदायी बनें, तो भारत न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि नैतिक रूप से भी समृद्ध राष्ट्र बन सकता है। यही समय है-सवाल पूछने का, आत्ममंथन करने का, और जिम्मेदार समाज के निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाने का।