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भारत में हैं एआई ‘महाशक्ति’ बनने की पूरी संभावनाएँ

डॉ. शैलेश शुक्ला
बेल्लारी (कर्नाटक)
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कृत्रिम मेधा (एआई) का युग केवल तकनीकी परिवर्तन का दौर नहीं है; यह वैश्विक शक्ति-संतुलन के पुनर्निर्माण का समय भी है। औद्योगिक क्रांति ने जिन देशों को आर्थिक नेतृत्व दिया, डिजिटल क्रांति ने जिन देशों को तकनीकी प्रभुत्व दिलाया, उसी क्रम में एआई क्रांति उन देशों को अगली वैश्विक बढ़त देगी, जो कम्प्यूट, डॉटा, प्रतिभा और नीति-चारों मोर्चों पर संतुलित तैयारी कर पाएँगे। भारत आज उसी ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वह एआई का मात्र उपभोक्ता नहीं, बल्कि मानक-निर्माता बनने की क्षमता रखता है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ हासिल की हैं, वे एआई के लिए ठोस आधार प्रदान करती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की जून २०२५ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए भारत सरकार ने दिसंबर २०२५ में बताया कि एकीकृत भुगतान इंटरफेस लेन-देन मात्रा के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा त्वरित-भुगतान प्रणाली बन चुका है। यह तथ्य केवल डिजिटल भुगतान की सफलता नहीं दर्शाता, बल्कि सिद्ध करता है कि भारत विशाल पैमाने पर सुरक्षित, भरोसेमंद और उच्च-आवृत्ति डिजिटल प्रणालियाँ संचालित करने की क्षमता रखता है। एआई आधारित जोखिम प्रबंधन, धोखाधड़ी पहचान और डॉटा विश्लेषण के लिए यही स्केल भविष्य में निर्णायक सिद्ध हो सकता है।
एआई महा शक्ति (सुपर पावर) बनने के लिए कम्प्यूट क्षमता अत्यंत आवश्यक है। हाल में आयोजित ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट २०२६’ के संदर्भ में बताया गया कि भारत ने जीपीयू क्षमता में उल्लेखनीय विस्तार का लक्ष्य रखा है और इसे शोधकर्ताओं, स्टार्ट-अप तथा संस्थानों के लिए सुलभ बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इसी मंच से कम्प्यूट संसाधनों को कम लागत पर उपलब्ध कराने की रणनीति पर भी बल दिया गया। यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि एआई में असमानता अक्सर कम्प्यूट संसाधनों की असमानता से उत्पन्न होती है। यदि भारत कम्प्यूट को लोकतांत्रिक रूप से उपलब्ध करा देता है, तो उसकी विशाल प्रतिभा-सम्पदा को वास्तविक नवाचार-शक्ति में बदला जा सकता है।
मानव संसाधन (एच.आर.) भारत की सबसे बड़ी ताकत है। विश्व की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों और शोध संस्थानों में भारतीय मूल के विशेषज्ञों की महत्वपूर्ण उपस्थिति इस तथ्य का प्रमाण है, कि देश में गणित, कम्प्यूटर विज्ञान और अभियांत्रिकी की मजबूत परंपरा है। चुनौती यह है कि यह प्रतिभा देश के भीतर शोध, स्टार्ट-अप और उत्पाद-विकास में कैसे रूपांतरित हो। इसी दिशा में भारत के जनरेटिव एआई स्टार्ट-अप्स की बढ़ती फंडिंग एक सकारात्मक संकेत देती है। नैसकॉम की ‘इंडिया जनरेटिव एआई स्टार्ट-अप लैंडस्केप २०२५’ रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि २०२५ की पहली छमाही तक भारतीय जनरेटिव एआई स्टार्ट-अप्स की संचयी फंडिंग लगभग ९९० मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच चुकी थी और वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि दर्ज की गई। यह संकेत है कि निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है। हालांकि, वैश्विक प्रतिस्पर्धा के स्तर तक पहुँचने के लिए और बड़े दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता बनी हुई है।
एआई में हार्डवेयर-स्वायत्तता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गुजरात में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की सेमीकंडक्टर फैब परियोजना में ९१,५२६ करोड़ ₹ के निवेश तथा प्रति माह लगभग ५० हजार वेफर-स्टार्ट्स क्षमता के लक्ष्य का उल्लेख किया गया है। यह विकास इसलिए निर्णायक है, क्योंकि एआई का भविष्य चिप-निर्भर है। यदि भारत हार्डवेयर वैल्यू-चेन में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराता है, तो वह एआई पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक स्थिरता दे सकता है।
उद्योग-स्तर पर एआई अंगीकरण भी तेजी से बढ़ रहा है। नैसकॉम के अनुसार ८७ प्रतिशत उद्यम किसी न किसी रूप में एआई समाधान उपयोग कर रहे हैं। इसका अर्थ है कि एआई अब प्रयोगशाला की अवधारणा नहीं, बल्कि व्यापारिक वास्तविकता बन चुका है। वित्त, बीमा, दूरसंचार, ई-कॉमर्स और विनिर्माण क्षेत्रों में एआई आधारित विश्लेषण, ग्राहक सेवा और स्वचालन से उत्पादकता में सुधार देखा जा रहा है। यदि यह रुझान निरंतरता पाता है, तो एआई भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है।
मीडिया और रचनात्मक उद्योग भी एआई से व्यापक परिवर्तन देख रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि एआई अपनाने से भारत वैश्विक मीडिया में अपनी हिस्सेदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है। यह अवसर विशेष रूप से भारतीय भाषाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यदि भारत बहुभाषी एआई मॉडल, स्वचालित अनुवाद, आवाज़-आधारित इंटरफेस और स्थानीय सामग्री निर्माण उपकरण विकसित करता है, तो वह न केवल घरेलू जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए भी समाधान निर्यात कर सकता है।
हालांकि, इस प्रगति के साथ जोखिम भी जुड़े हैं। एआई अवसंरचना के विस्तार से ऊर्जा मांग और जल-उपयोग जैसे पर्यावरणीय प्रश्न उठते हैं। एआई इम्पैक्ट समिट से जुड़ी रिपोर्टों में डेटा सेंटरों से संभावित जल दबाव पर चिंता व्यक्त की गई है। यह संकेत देता है कि एआई विकास को ऊर्जा-दक्षता और अक्षय ऊर्जा नीति के साथ समन्वित करना होगा। तकनीकी नेतृत्व तभी टिकाऊ होगा, जब वह पर्यावरणीय संतुलन के साथ आगे बढ़े।
भारत के एआई महा शक्ति बनने की राह में एक और निर्णायक तत्व है- भरोसा। हाल के महीनों में एआई जनित सामग्री और डीपफेक के संदर्भ में भारत ने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों को कड़ा किया है। यह दिखाता है कि भारत गलत सूचना से निपटने को गंभीरता से ले रहा है, पर साथ ही यह भी आवश्यक है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पारदर्शिता बनी रहे। एआई महाशक्ति वही बन सकता है, जो तकनीकी प्रगति और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करे।
अगले २ वर्षों में भारत को ४ प्राथमिकताओं पर स्पष्ट ध्यान देना होगा- सुलभ कम्प्यूट अवसंरचना, उच्च गुणवत्ता वाले भारतीय भाषाई डॉटासेट, दीर्घकालिक अनुसंधान फंडिंग और पारदर्शी नियामक ढांचा। यदि ये स्तंभ मजबूत होते हैं, तो भारत न केवल एआई उत्पादों का उपभोक्ता रहेगा, बल्कि वैश्विक मानक तय करने वाला देश बन सकता है।

भारत के पास एआई महाशक्ति बनने की पूरी संभावनाएँ इसलिए हैं क्योंकि उसके पास विशाल डिजिटल उपयोग-आधार, बढ़ती कम्प्यूट क्षमता, उभरता स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र, और बहुभाषी सांस्कृतिक विविधता-ये सब एकसाथ मौजूद हैं, परंतु संभावना अपने-आप उपलब्धि में नहीं बदलती। इसके लिए दूरदर्शी नीति, स्थायी निवेश, पर्यावरणीय संतुलन, और लोकतांत्रिक विश्वास की रक्षा आवश्यक है। यदि भारत इन शर्तों को साध लेता है, तो वह केवल कृत्रिम मेधा तकनीक में नहीं, बल्कि मानव केंद्रित, समावेशी और विश्वसनीय एआई मॉडल प्रस्तुत करने में भी वैश्विक नेतृत्व प्राप्त कर सकता है। यही वह दिशा है जिसमें भारत का भविष्य ‘डिजिटल शक्ति’ से आगे बढ़कर ‘एआई महाशक्ति’ बन सकता है।