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माहवारी:सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय

ललित गर्ग

दिल्ली
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भारत के सामाजिक विकास की यात्रा में महिलाओं की स्थिति हमेशा एक निर्णायक कसौटी रही है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति केवल आर्थिक आँकड़ों या बुनियादी ढाँचे से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि वह अपने समाज के आधे हिस्से-महिलाओं को कितना सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर देता है। इसी सन्दर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने ३० जनवरी २०२६ को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मासिक धर्म स्वास्थ्य को संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया है।

न्यायालय ने देश के सभी सरकारी और निजी विद्यालयों में छात्राओं को मुफ्त और सुरक्षित बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। मासिक धर्म स्वच्छता को गरिमा और स्वास्थ्य के साथ जीने के मौलिक अधिकार का हिस्सा माना गया है। शालाओं में साफ-सुथरे शौचालय और पानी की उचित व्यवस्था अनिवार्य है। इस निर्णय का उद्देश्य मासिक धर्म के कारण लड़कियों की पढ़ाई में होने वाली बाधा को रोकना और शर्मिंदगी से बचाना है। न्यायालय का यह फैसला महिलाओं और विशेषकर शालेय लड़कियों की माहवारी से जुड़ी समस्या पर दिया गया ऐतिहासिक निर्णय सशक्त और दूरदर्शी कदम है। इसी दिशा में कर्नाटक सरकार ने सरकारी और निजी क्षेत्र की महिला कर्मचारियों के लिए १२ दिन के सवेतन मासिक धर्म अवकाश नीति को भी मंजूरी दी है। यह फैसला शालाओं में मासिक धर्म प्रबंधन की कमी को दूर करने और छात्राओं के सम्मानजनक शिक्षा के अधिकार की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम है। पैड उपलब्ध कराने का निर्देश केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना को झकझोरने वाला संदेश है कि अब माहवारी जैसे विषय को चुप्पी, लज्जा और अज्ञान के अंधेरे में नहीं छोड़ा जा सकता।
विडम्बना यह है कि जिस माहवारी को प्रकृति ने जीवन-चक्र का अनिवार्य और स्वस्थ हिस्सा बनाया है, उसे हमारे समाज ने सदियों से अपवित्रता, अशुद्धता और वर्जना से जोड़ दिया। परिणामस्वरूप, करोड़ों महिलाएँ और किशोरियाँ न केवल शारीरिक कष्ट झेलती हैं, बल्कि मानसिक पीड़ा, हीनभावना और सामाजिक बहिष्कार का भी सामना करती हैं। आज भी भारत के अनेक हिस्सों में माहवारी के दौरान लड़कियों को रसोई, पूजा, विद्यालय और सामाजिक गतिविधियों से दूर रखा जाता है। यह व्यवहार केवल परम्परा नहीं, बल्कि स्त्री की गरिमा और अधिकारों का प्रत्यक्ष हनन है। न्यायालय की टिप्पणी- “माहवारी स्वच्छता की कमी महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाती है” इस पूरे विमर्श को एक नई संवैधानिक दृष्टि देती है। संविधान द्वारा प्रदत्त जीवन और गरिमा के अधिकार को यदि वास्तविक अर्थों में लागू करना है, तो महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता देनी ही होगी। शालाओं में उक्त अनिवार्य व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई अध्ययन बताते हैं कि स्वच्छता सुविधाओं के अभाव में बड़ी संख्या में लड़कियाँ किशोरावस्था में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं। यह केवल शिक्षा का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे समाज की बौद्धिक और नैतिक पूंजी की क्षति है।
न्यायालय ने इस निर्णय को केवल आदर्शों की घोषणा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जमीन पर उतारने के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक निर्देश दिए हैं। कक्षा ६ से १२ तक की सभी छात्राओं को मुफ्त, उच्च गुणवत्ता वाले ऑक्सो-बायोडिग्रेडेबल सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने के आदेश में सहज, सुरक्षित और गोपनीय उपलब्धता के लिए वेंडिंग मशीन या नामित अधिकारी की व्यवस्था तय की गई है, जिससे छात्राओं की असहजता पूरी तरह दूर की जा सके। निजी विद्यालयों में निर्देशों की अवहेलना पर मान्यता रद्द करने का प्रावधान रखकर जवाबदेही को मजबूत किया गया है, ताकि यह फैसला केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि हर छात्रा के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सके।
आज भी अनेक लड़कियाँ पहली माहवारी के समय भय, भ्रम और अपराधबोध से घिर जाती हैं, क्योंकि उन्हें पहले से कोई वैज्ञानिक और संवेदनशील जानकारी नहीं दी जाती। शालाओं में यदि स्वास्थ्य शिक्षा को गंभीरता से लागू किया जाए और माहवारी को एक सामान्य जैविक प्रक्रिया के रूप में समझाया जाए, तो यह डर और संकोच स्वतः समाप्त हो सकता है। यह भी सच है कि माहवारी को लेकर समाज में फैली चुप्पी पुरुषों की भूमिका को भी प्रश्नों के घेरे में लाती है। जब तक पुरुष-चाहे वे पिता हों, शिक्षक हों, प्रशासक हों या नीति-निर्माता, इस विषय को केवल ‘महिलाओं का मामला’ मानकर किनारे करते रहेंगे, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं। न्यायालय के निर्देश इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने समाज और खासकर पुरुषों को संवेदनशील बनने का अवसर दिया है। जागरूकता का अर्थ केवल महिलाओं को सशक्त बनाना नहीं, बल्कि पुरुषों को सहृदय और जिम्मेदार बनाना भी है, क्योंकि
ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में माहवारी से जुड़ी चुनौतियाँ और भी गंभीर हैं। वहाँ आज भी कपड़े, राख या अस्वच्छ साधनों का उपयोग आम है, जिससे संक्रमण और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। सरकारी योजनाएँ और गैर-सरकारी प्रयास मौजूद हैं, परंतु उनकी पहुँच और प्रभावशीलता अभी भी सीमित है। यह निर्णय यदि ईमानदारी से लागू होता है, तो यह नीति और जमीन के बीच की खाई को पाटने में सहायक हो सकता है। इसलिए यह फैसला सामाजिक न्याय की अवधारणा को भी मजबूती देता है।
आज भारत आत्मनिर्भर भारत और विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखता है, किंतु यदि इस विकास की गाथा में महिलाओं की बुनियादी आवश्यकताएँ और सम्मान शामिल नहीं हैं, तो यह प्रगति खोखली सिद्ध होगी। माहवारी जैसे विषय पर खुली चर्चा उसी साहस का प्रतीक है। समाज में जन-जागृति लाना इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण है। कानून और आदेश दिशा दिखा सकते हैं, परंतु मानसिकता बदलना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।