नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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अमृत की रात (शरद पूर्णिमा विशेष)…
शरद पूर्णिमा की आई रात,
अमृत बरसाने आई रात
चाँद सोलहवीं कला से पूर्ण, सजी हुई रात,
चाँदनी बिखेर रही सारी रात
शरद पूर्णिमा कही जाती अमृत की रात,
चाँद अमृत बरसाता सारी रात।
आज ही का दिन रास की लीला कहलाता,
कृष्ण ने गोपियों से वादा किया था
शरद पूर्णिमा के दिन रास करेंगे,
गोपियों के साथ सारी रात
कृष्ण ने अपनी बाँसुरी फूँकी और मन बनाया,
रातें लंबी बनाईं, एक दिन में बहुत लंबी।
रास के समय हर गोपी के साथ एक कृष्ण नाचते हैं,
हज़ारों गोपियाँ थीं, कृष्ण स्वयं हज़ारों रूपों में बँट गए
किसी गोपी को पता नहीं चला कि कृष्ण हज़ारों बन गए,
वह यही समझ रही थी कि कृष्ण केवल मेरे साथ हैं।
कृष्ण ने सभी गोपियों का मन हर लिया।
चाँदनी रात अपनी चाँदनी बिखेर रही,
चारों तरफ़ फूल ही फूल खिले हैं
पेड़ों पर फल लदे हैं, खुशबू महक रही,
मीठी-मीठी खुशबू हवाओं में फैल रही।
सभी मस्त हैं, रास कर रहे,
थकने का नाम नहीं ले रहे
मीठी-मीठी सुगंध से सभी मदहोश हो रहे,
यही गोपियों का रास, कृष्ण का प्रेमदान है।
कृष्ण ने सबको प्रेम दिया,
अपना बनाया
मन का अमृत बाँटा
यही महत्व है रास का।
संपूर्ण ब्रह्मांड में गोपी-प्रेम ही सर्वश्रेष्ठ प्रेम होता है
और यही प्रेम सभी मानव,
मन के लिए अमृत है।
आज के दिन खीर बनाई जाती,
रात में चाँदनी में रखी जाती
खीर में चाँद से अमृत झरता,
शरद में अमृत बरसाता चाँद है।
आज की रात ही मेरे गुरुवर,
श्री कृपालुजी महाराज की जन्मतिथि है,
वे हम सभी को,
मन का अमृत बाँटते हैं॥