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अपना कौन, सब अकेले

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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अब मन नहीं करता,
किसी को अपना कहने का
रिश्ते बेईमान-से लगते हैं,
हर बात अपरिचित-सी लगती है।

अब तो अपनी परछाई भी,
पराई-सी प्रतीत होती है
आइने में अपना ही चेहरा,
धुंधला, थका-थका दिखता है।

हम भी अब खुद से,
अनजाने हो चले
मन अपना नहीं रहा—
बस अपने होने का आभास बचा है।

पास बैठा इंसान भी,
अब मनुष्य नहीं लगता
उसकी निगाहों में प्रेम कम,
भय अधिक झलकता है।

दुनिया अब हमें जान गई,
पर हम अपने-आपसे अनजान हैं
कोई नहीं है अब मेरा,
अब मन सदा अकेला-अकेला रहता है।

हम कहते हैं — परिवार हमारा है,
पर यही परिवार बदल लेता है रुख अपना
जब तन थककर गिर पड़े किसी क्षण,
अब तो हर राह से सावधानी से गुजरना है।

पहले पहचान लो दिल, तब देना,
अब जानो — कौन इंसान है
सबके चेहरे पर चेहरा,
पहचानो — कौन दरिंदा।

भीड़ में खो गए हम,
अपना अब कोई न बचा
खामोशी के सन्नाटे में डूबा मन सबका है,
अब कोई अपना नहीं, सब पराए-पराए लगते हैं।

साथ चलने वाला भी
हमदर्द न लगता है,
कोयल की मीठी पुकार से
कोमलता रूठ गई है
पपिहा भी अब टहनियों पर नहीं गाता,
आम भी अब पेड़ों पर नहीं पकता।

हर मौसम अब कुछ पराया-सा लगता है,
और अपना कहे जाने वाला भी
कुछ अजनबी-सा लगता है।
किसको कहें, क्या ही कहें,
अब मन सदा अकेला-अकेला-सा लगता है॥