कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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मनुष्य न समझे मनुष्य को,
रहें दूर सब अपनों से, करते आपस में भेद सदा।
छोटे-छोटे स्वार्थ लिए,
भाई, भाई को समझे नहीं,
नारी को बहन न माने —
कितनी नजरें फरेबी हैं!
मन को देखे कौन यहाँ,
सबकी बस तन पर नजर है।
अपने ही अपनों के हित में
तनिक नहीं संकोच करते,
औरों के सपनों की
बलि चढ़ाने से न डरते।
कलयुग की यही विडंबना —
भाई भाई को न पहचाने,
भाई-भाई में बैर घना है
घर की औरतें आपस में,
मनमुटाव पाले रहतीं,
किटी पार्टियों में रास रचातीं।
मंदिर जाने की रीत छूटी,
संतान भी माता-पिता की न रही
बाहर की दोस्ती ही भाती,
सोशल मीडिया पर यारी बढ़े
एक को छोड़ दूजे से मिले,
रिश्ते बनते-बिखरते
ब्रेक-अप पर ब्रेक-अप चले।
शादी-विवाह रस्म भर रह गए,
देहरी छोड़ होटल में बारात सजे
दादा-दादी कोने में सिमटे,
चाचा-ताऊ कौन पूछे ?
सब अपने बेटे-बेटी में उलझे।
मनुष्य की सोच कितनी गिर गई—
कलयुग की है यही विडम्बना॥