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अपने

मानकदास मानिकपुरी ‘ मानक छत्तीसगढ़िया’ 
महासमुंद(छत्तीसगढ़) 
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निज भाषा,निज धर्म को समझो,
गुरु भी यही सिखाते हैं।
गैरों के आचरण भी कभी-कभी,
खुद को नीचा दिखाते हैंll

जो अपने को छोड़,गैरों के हो जाते हैं,
ना ओ गैरों के होते है ना अपने रह पाते हैं।
कटता है जीवन कष्ट और तिरस्कार में,
न इधर के-न उधर के,बेहद ठोकर खाते हैंll

यकीन नहीं इतिहास झांक लो,
गुलाम पन्ने बताते हैं।
अपनों से दूरी बनाने वाले लोग,
कैसे-कैसे मारे जाते हैंll

अब भी वक्त है समझें बातें,
गैर तो भड़काते हैं।
अपने तो अपने होते हैं,
जो समय में काम आते हैंll