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अब तक भी आस अधूरी

संजय गुप्ता  ‘देवेश’ 
उदयपुर(राजस्थान)

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कुछ कर गुजरने की तमन्ना बसी है,
सोच हमारी यही रही सदैव ऐसी है
मंजिलें पास हों यह बहुत जरूरी है,
यह तो अब तक भी आस अधूरी है…।

राम राज्य का आँखों में बसा सपना,
इक आस सदा,हर कोई हो अपना
दु:ख-दर्द मिट जाएँ हर जन-जन के,
साथ चलें मिल-जुल कर हम हँस के।
रहे क्यूँ लक्ष्य हासिल में अब दूरी है,
यह तो अब तक भी आस अधूरी है…।

सद् इच्छाओं का नहीं कभी दमन,
सदा रहे यहाँ बस शांति-चैन-अमन
कर्म पथ पर सदा बढ़ें धर्म के साथ,
ईश्वर कृपा हो हर बंदे को ही प्राप्त।
वसुधैव-कुटुम्बकम जीवन धुरी है,
यह तो अब तक भी आस अधूरी है…।

वन-उपवन रहें सदा हरे-महकते,
जीव नित हरषें पंछी सदा चहकते
सदा नीरा बहें सब नदियाँ पावन,
खेतों में बरसे झम-झम कर सावन।
किसानों की सभी खत्म मजबूरी है,
यह तो अब तक भी आस अधूरी है…।

विकास के पथ पर सबसे अग्रसर,
नाज करे दुनिया अपने भारत पर
वंदे-मातरम गूंजे सम्पूर्ण जगत में,
हर शत्रु रहे बस अपनी ही हद में।
विनाश हो जो,शक्तियाँ आसुरी है,
यह तो अब तक भी आस अधूरी है…॥

परिचय–संजय गुप्ता साहित्यिक दुनिया में उपनाम ‘देवेश’ से जाने जाते हैं। जन्म तारीख ३० जनवरी १९६३ और जन्म स्थान-उदयपुर(राजस्थान)है। वर्तमान में उदयपुर में ही स्थाई निवास है। अभियांत्रिकी में स्नातक श्री गुप्ता का कार्यक्षेत्र ताँबा संस्थान रहा (सेवानिवृत्त)है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप समाज के कार्यों में हिस्सा लेने के साथ ही गैर शासकीय संगठन से भी जुड़े हैं। लेखन विधा-कविता,मुक्तक एवं कहानी है। देवेश की रचनाओं का प्रकाशन संस्थान की पत्रिका में हुआ है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जिंदगी के ५५ सालों के अनुभवों को लेखन के माध्यम से हिंदी भाषा में बौद्धिक लोगों हेतु प्रस्तुत करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-तुलसीदास,कालिदास,प्रेमचंद और गुलजार हैं। समसामयिक विषयों पर कविता से विश्लेषण में आपकी विशेषज्ञता है। ऐसे ही भाषा ज्ञानहिंदी तथा आंगल का है। इनकी रुचि-पठन एवं लेखन में है।

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