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असमंजस

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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मन के विचारों का,
बवंडर
पता नहीं कहां लिए
जा रहा है।
एक अनजानी डगर पर,
कहां रुकेगा कुछ पता नहीं
लहरों की तरह,
लहरा रहा मन का समुंदर
जाने कब ठहर जाए,
ये जिंदगी।
सोच नहीं पाता मैं,
इतने लंबे सफर में क्या खोया
क्या पाया पता नहीं!
जी रहा हूँ,
अनिश्चितता की स्थिति में
अपनी भूली-बिसरी,
यादों के साथ।
जाने कितने स्वप्न,
स्वाहा हो गए समय के
हवन कुंड में,
सूखे हुए पत्तों की तरह
उड़ता जा रहा,
यह मन।
कब होगा विश्राम,
अथवा विराम
कुछ समझ नहीं पाता हूँ।
सब कुछ मृगतृष्णा,
जैसा लगता है
जो दिखता है वह है नहीं,
क्या इसी तरह पूरा होगा
सफर जिंदगी का!
हृदय जैसे भाव शून्य,
विचारों का
पड़ गया अकाल,
क्या नियति की है कोई चाल!
कब तक देनी होगी,
आहुति जीवन के
विशाल हवन कुंड में,
कब सार्थक हो पाएगा
मेरा यह जीवन!
कब मिलेगी,
पूर्ण शांति…?

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है