ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
*****************************************
बरसात का पानी, कागज की कश्ती,
छपाछप करता पानी, बच्चों की मस्ती।
बारिश की झमझम, बूंदों की छम-छम,
बड़ी ही लुभावनी, बच्चों की सरगम।
कागज की नाव बनाते, पानी में फिर बहाते,
जो खुशी चेहरे पर आती, वो अब बनती देखते।
पेड़ों पर लटकना, फिर पानी में छपकना,
धमाचौकड़ी उनकी, बंदरों-सा फुदकना।
बच्चों की शैतानी, याद करा देते नानी,
बच्चे ना होते तो, नहीं होती शोर-गुल कहानी।
मेघों की गर्जना और बिजलियों का चमकना,
बारिश के बाद सतरंगी इंद्रधनुष का निकलना।
बरसातों की शाम में पकौड़ियों का तलना,
गर्म चाय के साथ पकौड़ी खाना- खिलाना॥