नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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बुरो रिमझिम सावन में,
सिक्कों के साथ झम-झम बजरो रे।
चारों ओर की तस्वीरें घटी काली-काली हैं,
मन के बंजर सरकार को भी सींचो
भीगी-भीगी सुगंध, मधुर हवाएँ लेकर आएँ,
मेरा मन ख़ुशी से लहराए बारम्बार।
मेरा सूना-सूना आँगन,
मुर्गे और खिलखिलाए
वंदे-ठंडी मस्त हवाएँ
मन को हिलाएँ।
बातें-बातें याद आ ही जाती हैं,
जो मन को बहलावे।
घर का कोना-कोना भी
मुस्कुराने लग जाए।
मेघा रे मेघा,
आया सावन जूम के.
हर गली, हर मोड़ पर
आख़िरकार बँट जाए,
सारी साखियाँ जम रही हैं
सावन के बहारों में
विकल हैं सखियाँ सभी,
इन बहारों में झूला झूलने।
सावन आया
संग लेकर यादें पुरानी
मन के सूनेपन को
रह-रह कर मोक्ष दे,
गिनें नयनों को
बूटा-सा रुला
पानी में भिगाना,
झूलों पर झूलना।
यादों को कैसे प्यार करो,
इस सावन की बारिश में
ड्रीम की गैलरी में, मेघा
चल घूम आएँ।
सावन आयो,
सब गैंगबैंगें साथ लेकर
फिर गया
सारांश में,
हरी चंद्रा ओढ़े
धरती ख़ुशनुमा देखो,
झूले भी पेंगें फिल
मनो गगन को चल पड़े।
मेघा रे मेघा,
बुरो रिमझिम सावन में॥