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इस शहर में

सोनू कुमार मिश्रा
दरभंगा (बिहार)
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रैन में छाया घनघोर अंधेरा,प्रभात लेकर आया कुहासा,
दर्द से तड़पते,करवटें बदलते,मन में लिए विकट निराशा
छीन हो चुकी थी,दीन हो चुकी थी उसके जीवन की आशा,
कहर को झेलते,सफर को देखते,थी चलने की प्रत्याशा।

सड़क के किनारे,कराहते-चिल्लाते,तम की तमतमाहट में,
सुधाकर,दिवाकर के द्वारा दी गई तपन की कड़वाहट में
बहा रहा था भिगा रहा था निकाल रहा था अश्रुधारा,
आँखों में नीर लिए,प्रस्थिति गम्भीर लिए,था न कोई सहारा।

एक ओर निर्धनता,दूजे शरीर की दुर्बलता,
घेर रखा था,फांस रखा था,तनिक क्षणिक चेताती सज्जनता
पल-पल देती सिसकन हृदय को,मृत होती मानवता,
दुत्कार रहा था,बुला रहा था पास उसे,विकराल दानवता।

दर्द से कराहते रहा,चीखते-चिल्लाते रहा,
विस्मय ध्वनि ने कर्ण को बधिर कर रखा था
मुख से निकल न पा रही थी ध्वनि तनिक भी,
क्षुधा मिटा न पा रही थी दर्द क्षणिक भी।

उसने किया था आफतों से प्रणय पूर्वक आलिंगन,
उबलता उफनता आहें भरता रुधिर कर रखा था
झेल रहा था,खेल रहा था,वीभत्स काल चक्र से,
जूझ रही थी भुजाएं उसकी मस्तिष्क पर पड़े कुचक्र से।

सड़क किनारे शहर के मारे दो जून रोटी को तरसती,
अपने ईष्ट से सृष्टि से विनती कर अपने लिए मौत को मांगती
दर्द को,थकन को,वह सहन कर नहीं पा रहा था,
करता अनिष्ट परिवार की चिंता से अनिष्ट कर नहीं पा रहा था।

सुता सूत की व्याकुलता,भार्या की आकुलता,
उसे चैन से सोने न देती,रोने न देती,ला देती व्याकुलता
कोस रहा था,स्वयं को,मझधार में फँसने पर,
सदाचार सुविचार के जंजाल में उलझने पर।

तपन उसकी शायद हो सके न कम,
जीवन की खुशियां भी दे जाएं उसे गम
उलझा था कि शायद हों ये आफ़तें खत्म,
लेकिन कहीं बन न जाये लावारिस,मिले न उसे भी कफ़न।

मनुज को घेर रखा है,लपेट रखा है आधुनिकता के भंवर ने,
जीवन को अंधेर में रखा है भौतिकता के सफर ने
नींद-चैन छीन लिया है,भयानक इस कहर ने,
उसके जैसे न जाने कितने तड़पते हैं इस शहर में॥

परिचय-सोनू कुमार मिश्रा की जन्म तारीख १५ फरवरी १९९३ तथा जन्म स्थान दरभंगा(बिहार )है। वर्तमान में ग्राम थलवारा(जिला दरभंगा)में रहते हैं। बिहार राज्य के श्री मिश्रा की शिक्षा -स्नातकोत्तर(हिंदी) है। आप कार्यक्षेत्र में शिक्षक हैं। सामाजिक गतिविधि के तहत समाजसेवी हैं। लेखन विधा-कविता है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक चेतना जागृत करना औऱ वर्तमान में मातृभाषा हिन्दी का प्रचार करना है।