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…ईश्वर पर आस्था बने हमारी शक्ति

डॉ. आशा गुप्ता ‘श्रेया’
जमशेदपुर (झारखण्ड)
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ईश्वर और मेरी आस्था स्पर्धा विशेष…..

बचपन से ही माता पिता और गुरूजनों द्वारा प्रदर्शित संस्कारों में हमारी उत्कृष्ट संस्कृति से मेरा परिचय हुआ। इसके साथ हमारे भारतीय ग्रंथों को भी पढ़ने का सुअवसर मिला। जीवन यात्रा में बढ़ते हुए विभिन्न आस्थाओं से जुड़ी पुस्तकें भी पढ़ी,और समझना चाही। मैंने अनुभव किया कि आस्था का सार जीवन को तप,और संयम से आदर्श, परोपकारी,क्षमाशील,स्नेहिल,शक्तिशील आदि बनाने का ही संदेश है। मेरे विचार से ईश्वर के नाम पर इसी भाव को जगाने की क्रिया को आस्था कहते हैं,जो हमारे जीवन-दिनचर्या का अभिन्न अंग है। प्राय: घर-घर के संस्कारों में सुबह की बेला में देव पूजन अर्चन और संध्या दीपक आरती दिनचर्या का अभिन्न अंग है।
हमारे देश भारत में घर की दिनचर्या के साथ अनेक पूजा उत्सव की संस्कृति भव्य सामूहिक रूप में मनाने की प्रथा शुरू हुई,जिसमें आस्था की ही जागृति उद्देश्य है,पर शनैः-शनै: इसमें अनेक विकृतियाँ भी आ गई। ईश्वर के प्रति आस्था भी कहीं प्रश्न के कटघरे में आ खड़ी हुई। ईश्वर के नाम पर बहुत कुछ गलत होने लगा,ढकोसले भी होने लगे। इससे लोग अनभिज्ञ नहीं हैं। अब इस कोरोना काल में जब ऐसे पूजन उत्सव आयोजन कुछ संयमित नियमों से हो रहे हैं,तब भी भक्तजन प्रेम स्नेह श्रद्धा सहित पूजन कर रहे हैं।
मैंने अपनी विदेश यात्राओं में देखा कि,प्रवासी भारतीय जो अपने कर्म क्षेत्र में अति व्यस्त रहते हैं,फिर भी अपनी संस्कृति,संस्कारों को बडे़ सुंदर और सुलझे रूप में पालित करते हैं,उत्सव मनाते हैं। यह ईश्वर के प्रति निष्ठावान सत्य आस्था ही है। इसी तरह विदेशी भी त्योहार आदि मनाते हैं। इस तरह विश्व की कर्म क्रिया,दिनचर्या भी कहीं ना कहीं इससे जुड़ी हुई है।
हम सबका यह मानव जीवन शैली के किसी ना किसी रुप में परम के प्रति हमारी आस्था से जुड़ा हुआ है। मानव जीवन स्नेह प्रेम,सुख-दु:ख,तृष्णा,हार-जीत अनेक भँवरों में डूबता उभरता रहता है। संसार में कुछ अपवादों को छोड़कर हर मानव प्राणी किसी ना किसी आराध्य को अपने कर्म को आस्था सहित अर्पित करता है,आंतरिक शक्ति अर्जित करता है,और जीवन पथ पर आगे बढ़ता है। परमानंद या हताश के पल आस्था के संबल से ही जुड़े होते हैं। आस्था का अर्थ है, ईश्वर के प्रति सत समर्पित,अर्पण भाव। हमारी दिनचर्या,जीवन कहीं ना कहीं ईश्वर के लिए आस्था से ही है। उनके लिए हृदय के दीपक के प्रकाश संग श्रद्धा भाव का अर्पण कर विभिन्न तरहों से पूजन अर्चन,जप-तप कर हम सब अपने भीतर की शक्ति ईश्वर को जगाते हैं। ईश्वर को अंत: में देखना,पाना एक तप है,यह आसान नहीं,पर नामुमकिन भी नहीं है। आस्था संग ही इस नश्वर जीवन को अर्थ देना ही हमारा कर्म उद्देश्य होना चाहिए।
जन स्वयं को ईश्वर के प्रति निष्ठा भाव के दिनचर्या से अलग करने की सोच भी नहीं सकता। किसी ना किसी तरह यह ईश के प्रति आस्था है,जो विश्वास की धुरी है,उसकी उर्जा,उसकी शक्ति है,हमारे इस नश्वर मानुष जीवन के लिए। हमारा कर्तव्य है कि इस शक्ति को सत्य की खोज के पथ और मानवता के लिए उत्तम लक्ष्य की दिशा में ले जाएं।

परिचय- डॉ.आशा गुप्ता का लेखन में उपनाम-श्रेया है। आपकी जन्म तिथि २४ जून तथा जन्म स्थान-अहमदनगर (महाराष्ट्र)है। पितृ स्थान वाशिंदा-वाराणसी(उत्तर प्रदेश) है। वर्तमान में आप जमशेदपुर (झारखण्ड) में निवासरत हैं। डॉ.आशा की शिक्षा-एमबीबीएस,डीजीओ सहित डी फैमिली मेडिसिन एवं एफआईपीएस है। सम्प्रति से आप स्त्री रोग विशेषज्ञ होकर जमशेदपुर के अस्पताल में कार्यरत हैं। चिकित्सकीय पेशे के जरिए सामाजिक सेवा तो लेखनी द्वारा साहित्यिक सेवा में सक्रिय हैं। आप हिंदी,अंग्रेजी व भोजपुरी में भी काव्य,लघुकथा,स्वास्थ्य संबंधी लेख,संस्मरण लिखती हैं तो कथक नृत्य के अलावा संगीत में भी रुचि है। हिंदी,भोजपुरी और अंग्रेजी भाषा की अनुभवी डॉ.गुप्ता का काव्य संकलन-‘आशा की किरण’ और ‘आशा का आकाश’ प्रकाशित हो चुका है। ऐसे ही विभिन्न काव्य संकलनों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी लेख-कविताओं का लगातार प्रकाशन हुआ है। आप भारत-अमेरिका में कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्बद्ध होकर पदाधिकारी तथा कई चिकित्सा संस्थानों की व्यावसायिक सदस्य भी हैं। ब्लॉग पर भी अपने भाव व्यक्त करने वाली श्रेया को प्रथम अप्रवासी सम्मलेन(मॉरीशस)में मॉरीशस के प्रधानमंत्री द्वारा सम्मान,भाषाई सौहार्द सम्मान (बर्मिंघम),साहित्य गौरव व हिंदी गौरव सम्मान(न्यूयार्क) सहित विद्योत्मा सम्मान(अ.भा. कवियित्री सम्मेलन)तथा ‘कविरत्न’ उपाधि (विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ) प्रमुख रुप से प्राप्त हैं। मॉरीशस ब्रॉड कॉरपोरेशन द्वारा आपकी रचना का प्रसारण किया गया है। विभिन्न मंचों पर काव्य पाठ में भी आप सक्रिय हैं। लेखन के उद्देश्य पर आपका मानना है कि-मातृभाषा हिंदी हृदय में वास करती है,इसलिए लोगों से जुड़ने-समझने के लिए हिंदी उत्तम माध्यम है। बालपन से ही प्रसिद्ध कवि-कवियित्रियों- साहित्यकारों को देखने-सुनने का सौभाग्य मिला तो समझा कि शब्दों में बहुत ही शक्ति होती है। अपनी भावनाओं व सोच को शब्दों में पिरोकर आत्मिक सुख तो पाना है ही,पर हमारी मातृभाषा व संस्कृति से विदेशी भी आकर्षित होते हैं,इसलिए मातृभाषा की गरिमा देश-विदेश में सुगंध फैलाए,यह कामना भी है