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उन गलियों तक…

पूनम दुबे
सरगुजा(छत्तीसगढ़) 
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जिंदगी का सफर गलियों के
बिना अधूरा-सा रहता है,
हमारे बचपन के दिनों से
लेकर आज इस उम्र तक
उन गलियों तक…

कहीं भी जाएं,कहीं रहे
इक सपना पलता है,
वापस आकर मन की

गलियों में ठहरने लगता है,
ये हमारे अकेलेपन के
अपने साथी हैं,
जो मन को बहुत
सुकून मिलता रहता है।
उन गलियों में…

उन गलियों में कालेज के
वो सुनहरे दिन जैसे कैद हों,
सब दोस्तों के साथ खट्टी मीठी इमली
और नमक वाले अमरूद,
क्या याद करूं-कैसे करूं
मौसम बदल गये पर स्वाद,
गलियों में बसे हैं…।
उन गलियों तक…

आज भी थक हार कर
वापस समय निकाल कर,
उन गलियों में आ जाती हूँ
इतंजार करती है मेरा सब,
घेर लेती हैं मुझे सबकी सब।
उन गलियों में…

उनसे मिल कर कहाँ-कहाँ
चली जाती हूँ..ढेर सारी बातें,
होती हैं बस..बात-बात करते
कब मेरी आँख लग जाती है,
सब सुला देती है मेरी यादें
सच्ची दोस्ती जो है।
उन गलियों तक…

सुबह उठकर अच्छा
महसूस करती हूँ,
फिर से उनसे मिलने के लिए
सब काम समेटने में,
इतंजार में लग जाती हूँ
मेरी जिंदगी की राजदार,
सारी यादें धरोहर है
उन गलियों में जिसका,
हर पल इंतजार रहता है।
उन गलियों में……॥

परिचय-श्रीमती पूनम दुबे का बसेरा अम्बिकापुर,सरगुजा(छत्तीसगढ़)में है। गहमर जिला गाजीपुर(उत्तरप्रदेश)में ३० जनवरी को जन्मीं और मूल निवास-अम्बिकापुर में हीं है। आपकी शिक्षा-स्नातकोत्तर और संगीत विशारद है। साहित्य में उपलब्धियाँ देखें तो-हिन्दी सागर सम्मान (सम्मान पत्र),श्रेष्ठ बुलबुल सम्मान,महामना नवोदित साहित्य सृजन रचनाकार सम्मान( सरगुजा),काव्य मित्र सम्मान (अम्बिकापुर ) प्रमुख है। इसके अतिरिक्त सम्मेलन-संगोष्ठी आदि में सक्रिय सहभागिता के लिए कई सम्मान-पत्र मिले हैं।