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उफ़…ये गर्मी!

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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उफ़…ये गर्मी त्रासदी, जेठ दुपहरी ताप।
फिर भी पत्थर तोड़ते, मज़बूरी अभिशाप॥

शीतल मंद समीर नित, कहीं धूप कहँ छाँव।
उमर-घुमड़ बरसे घटा, पुन: तपिश उद्भाव॥

आगम सावन घन गगन, आशा राहत छाँव।
ग्रीष्मातप आहत बदन, जले धूप तनु घाव॥

उफ़…ये गर्मी विकलता, जीव जन्तु आकूल।
सूख रहा गल जल बिना, धूप बनी है शूल॥

लस्सी सत्तू शरबतें, बहुविधि ठंडा पेय।
शरबत आम कच्चे-पके, नींबू पानी धेय॥

भींगें चहुँ मुख तन वसन, बूंद पसीना घाम।
कहीं धूप-छाया कहीं, शुष्क गला अविराम॥

लू झुलसाता जिंदगी, तरु वन दे नित छाँव।
गमों ज़ख्म जलकर मनुज, गर्मी दे नित घाव॥
विपदा पीड़ा धूप में, दहके लक्ष्य महान।
नवल शोध संघर्ष पथ, मिले छाॅंव यश मान॥

समझ धूप शैतानियत, छाॅंव समझ इन्सान।
मिथ्या खल छल धूप जग, छाॅंव बने ईमान॥

देशद्रोह जलती किरण, जले मनुजता धूप।
नीति प्रीति औदार्य तरु, मिले छाॅंव जन भूप॥

सूखी धरती है फटी, जली खेत चहुँओर।
तपा रही भू रविकिरण, साॅंझ रात या भोर॥

बंजर फटती खेत को, पीड़ित देख किसान।
आश हृदय जलवृष्टि घन, दे बरखा भगवान॥

बिन बरखा भू हरितिमा, सरिता शुष्क तडाग।
उपवन तरुवर गिरि शिखर, सूख गये जल आग॥

छुट्टियों का वक्त है, विकट कहर है धूप।
मई जून भू जल रही, लू धरता विद्रूप॥

सूर्य धरा ढाता कहर, जले भाल अरु नैन।
सुबह-शाम तन मन विकल, दिनचर्या बेचैन॥

ठंडे शीतल पेय जल, ग्रीष्मातप दे शान्ति।
कर्तन तरुवर गिरि सरित, होता जीवन क्लान्ति॥

खान-पान बदले मनुज, दही नित्य अनिवार्य।
ठंडक शरबत बेल दे, बढ़े बर्फ बहु कार्य॥

लीची जामुन कटहलें, पकते बहु रस आम।
गर्मी ऋतुफल ये सभी, पोषक मधु सुखधाम॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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