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एक सुरमई शाम में…

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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एक सुरमई शाम में देखा है आज दूर से,
उसका हँसता चेहरा, आहिस्ता-आहिस्ता
आसमान ने ओढ़ ली शाम रंग की चुनरी,
मेरा मन मुस्कुरा उठा, उसे सामने पाकर।

एक सुरमई शाम में,
दिल बेचैन रहता है उसके दीदार के लिए
मेरी निगाहें मचलती रहती हैं उसके पास जाने को,
आँखों में बसा रहता है उसका हँसता चेहरा।

मन में बस गई है, जैसे कोई पुराना संबंध हो,
जैसे उससे मेरा रिश्ता बहुत पुराना हो
अनजानी-सी इस पहचान में भी अपनापन है,
एक सुरमई शाम में कुछ अपना-सा लगता है।

चाय की चुस्की भी आज अच्छी लगती है,
तेरे इंतजार में हर पल खास लगता है
पक्षी भी अपने घोंसलों में लौट आए हैं,
और मन यादों के जंगल में भटक रहा है।

अगर तू मिल जाए उस शाम में,
तो यह शाम और भी हसीन हो जाए
तेरी एक झलक से दिल को सुकून मिले,
और मेरी ज़िंदगी मुस्कुराने लगे।

एक सुरमई शाम में देखा है आज दूर से,
तुझे देखकर दिल ने बस इतना कहा-
पास आकर मेरा हाथ थाम लो,
थाम लो दिल मेरा, इस सुरमई शाम में॥