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मिठास अब पहले सी नहीं

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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अमृत की रात (शरद पूर्णिमा विशेष)…

शरद पूर्णिमा की रात रंगीन होती नहीं,
शरद चाँद में भी पूरा चाँद होता नहीं।

महबूब में भी प्रेम पूरा होता कहाँ,
हर मुलाकात में भी खुशियाँ होती नहीं।

तारे बिखरे हैं पर चमक होती कम,
अब तो मुलाकात में भी प्रेम होता नहीं।

फिर से कटोरी सजाई है उसमें, मिठास अब पहले सी होती नहीं।

रब भी मजबूर हैं हमारी मुस्कान के लिए,
खुशी दे भी दे, तो हमारे पास ठहरती नहीं।

अब ज़िंदगी में बस रब की रहमत है,
अब तो किस्मत में भी रहमत साथ होती नहीं।

हरदम मेरे साथ रहना भगवान,
अब शिकायत भी तुझसे होती नहीं।

अब ‘शरद पूर्णिमा’ में वह प्रेम कहाँ,
अब जीवन में तारे भी गहरे होते नहीं॥