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ऐसा धाम हो वसुंधरा

संदीप धीमान 
चमोली (उत्तराखंड)
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हो हरित वसुन्धरा….

हो हरित वसुन्धरा
स्वर्ग लगे ये जो धरा,
कल्पवृक्ष-सी छाँव हो
पतझड़ जो हो हरा।

जाप, ताप, ध्यान को
वसुंधरा के मान को,
शांत चित्त ज्ञान को
आत्म हरित बुन धरा।

शूल के जो घाव हो
धूल में जो पाँव हो,
आर्यु लेप कष्ट हरा
हरित श्वाँस स्वच्छ भरा।

देव कर्ज चढ़ाएं क्यों ?
मर्ज पितृ बढ़ाए क्यों ?
काष्ठ चिता जो चाहिए
बीज रोपित हो धरा।

कृष्ण जप, राम जप,
जप तू हरि हरा।
शिव हरित में छिपा,
ऐसा धाम हो वसुंधरा॥

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