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कब आओगे साजन

नरेंद्र श्रीवास्तव
गाडरवारा( मध्यप्रदेश)
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घर,आँगन,गलियाँ,चौराहे,सूने-सूने लगते हैं।
वापस कब आओगे साजन,राह तुम्हारी तकते हैं॥

चिड़ियाँ फुदकें आँगन में आ,
पहले जैसी बात नहीं।
खिलें फूल खुशबू भी देते,
उसमें वैसी रास नहीं।
पवन झकोरे मद्धिम-मद्धिम,बेमन-बेमन बहते हैं,
घर,आँगन,गलियाँ,…॥

सूरज रहता है दिनभर पर,
ना बोले,ना बतियाये।
हाल रात का भी ऐसा है,
लगे,अश्क़ अब झलकाये।
चाँद,सितारे गुमसुम बैठे,खोये-खोये रहते हैं,
घर,आँगन,गलियाँ,…॥

चारों तरफ उदासी पसरी,
दूर-दूर तक तनहाई।
हूक उठे,ले चुभन शूल-सी,
ना स्वर है,ना शहनाई।
विरह वेदना तप्त अगन-सी,तपते-तपते रहते हैं,
वापस कब आओगे साजन,राह तुम्हारी तकते हैं॥

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