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कांग्रेस:बहुसंख्यक मतदाता को फिर जोड़ने की असल चुनौती

अजय बोकिल
भोपाल(मध्यप्रदेश) 

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देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के ‘नवसंकल्प चिंतन शिविर’ में दल के बुनियादी मसलों और चुनौतियों से निपटने को लेकर ठोस निष्कर्ष भले न निकला हो, लेकिन यह संदेश देने की कोशिश जरूर की है कि कांग्रेस जिन अंतर्विरोधों से गुजर रही है, उन्हें गंभीरता से लेने का वक्त आ गया है। यह बात अलग है कि शिविर चलते समय और उसके समापन के बाद ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं सुनील जाखड़ और हार्दिक पटेल ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया। यानी शिविर में चिंतन के बावजूद कांग्रेस छोड़ने वालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
बहरहाल, शिविर में चर्चा के दौरान दल के पूर्व अध्यक्ष सांसद राहुल गांधी ने खुले तौर पर माना कि दल का जनता से कनेक्शन टूट गया है। शिविर में भाजपा पर जवाबी हमले के रूप में ‘छद्म राष्ट्रवाद’ के नए हथियार को धार देने का फैसला हुआ। इससे भी दिलचस्प निर्णय देश में कांग्रेस द्वारा गांधी जयंती २ अक्टूबर से ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकालने का है। इसके अलावा पार्टी राज्यों में ‘जन जागरण यात्राएं’ भी निकालेगी।
मजेदार बात यह है कि यात्रा का यह विचार नया नहीं है। सबसे पहले यह विचार गांधीवादी पत्रकार यदुनाथ थत्ते के मन में १९७३ में आया था, जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की दंबगता का डंका बज रहा था। यदुनाथ थत्ते वही साहसी पत्रकार- संपादक थे, जिन्होंने आपातकाल का पुरजोर विरोध किया था।
श्री थत्ते के विचार को अमली जामा पहनने में १५ साल का वक्त लगा। १९८५ में जब पंजाब खालिस्तानी आतंकवाद से सुलग रहा था और हिंदू‍-सिख सद्भाव में दरारें पड़ने लगी थीं, उस वक्त बाबा आमटे ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकलने का ऐलान किया। उस वक्त देश में प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन देश टूटता लग रहा था। यह यात्रा दिसम्बर १९८५ में शुरू हुई और अयोध्या में राम लला के मंदिर के ताले खुलने तक जारी रही। बाद में २ साल बाबा ने गुजरात से अरूणाचल तक भी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकाली, लेकिन उन यात्राओं का कोई बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ, क्योंकि देश की राजनीतिक दिशा तेजी से बदल रही थी।
कांग्रेस अब उसी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ को नए सिरे से निकालना चाहती है तो अच्छी बात है, लेकिन उससे दल को राजनीतिक लाभ कितना मिलेगा, कहना मुश्किल है। भारत को समझने के लिए लंबी यात्राएं हमेशा मददगार रही हैं। राहुल गांधी को यह काम बहुत पहले करना चाहिए था।
कांग्रेस ने ‘छद्म राष्ट्रवाद’ को मुद्दा बनाने और इसी की बिना पर भाजपा के हिंदू राष्ट्रवाद की असलियत को उजागर करने का संकल्प लिया है, लेकिन यह जनता के गले उतारना आसान इसलिए नहीं है, क्योंकि खुद कांग्रेस इस मामले में स्पष्ट नहीं है। कभी वह धर्मनिरपेक्षता की बात करती है तो कभी नरम हिंदुत्व की। शाह बानो प्रकरण में तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता देने के उच्चतम न्यायालय के फैसले को तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने १९८६ में मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार संरक्षण अधिनियम) विधेयक पारित कर कमजोर कर दिया, जबकि यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के हित में था, लेकिन कांग्रेस कट्टरपंथी मुसलमानों के दबाव में आ गई। ऐसे में सवाल यह उठा कि जब कांग्रेस हिंदुओं के सामाजिक धार्मिक कायदों के लिए हिंदू कोड बिल बना सकती है तो मुसलमानों के पर्सनल लाॅ में हस्तक्षेप से क्यों बचना चाहती है ? भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने इसे कांग्रेस की ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ कहा। धीरे-धीरे यह बात बड़ी संख्या में हिंदुओं के मन में पैठने लगी, जिसने भविष्य में भाजपा में सत्ता में आने के रास्ते तैयार कर दिए। अब कांग्रेस अगर भाजपा पर ‘छद्म राष्ट्रवादी’ कहकर हमला करेगी तो ऐसा करके वो अपना कौन-सा मत बैंक सुरक्षित करेगी, यह मार्के का सवाल है। क्योंकि भाजपा ने बड़ी चतुराई से हिंदुत्व और राष्ट्रवाद को मिला दिया है। कांग्रेस इस मामले में अपने अतीत से पीछा कैसे छुड़ाएगी। उसके पास ऐसे संचारक नेता कहां हैं, जो तार्किक ढंग से और आम आदमी की भाषा में हिंदू राष्ट्रवाद, भारतीय राष्ट्रवाद और कांग्रेसी राष्ट्रवाद का फर्क समझा सकें ? कहीं ऐसा न हो कि यह मुद्दा बस कोरा प्रचार साबित हो जाए ?
यह सही है कि कभी पूरे देश पर राज करने वाली कांग्रेस अब महज २ राज्यों में सिमट गई है। भाजपा के साथ साथ क्षेत्रीय दल भी उसे चुनौती दे रहे हैं। लिहाजा कांग्रेस के सामने चुनौती दोहरी है। दल ने समान विचारों वाली पार्टियों से गठजोड़ करने की बात कही है, लेकिन इसके लिए पहले कांग्रेस को खुद सेनापति की भूमिका में आना होगा। यह काम बहुआयामी तरीके से और त्वरित निर्णयों के जरिए होना चाहिए। शीर्ष नेतृत्व और आम कांग्रेस कार्यकर्ता के बीच दूरियां घटनी चाहिए। सड़क पर संघर्ष केवल दिखावटी नहीं रहना चाहिए। जब बात फैसलों और उसके अमल की आती है तो अक्सर ‘कांग्रेस संस्कृति’ की दुहाई दी जाती है। अगर ‘अनिर्णय’ ही ‘कांग्रेस संस्कृति’ है तो पार्टी को २१ वीं सदी में लौटने की जरूरत है। कार्यकर्ता में यह संदेश जाना चाहिए कि कांग्रेस सचमुच बदलना चाहती है। वक्त की चुनौतियों से दो-चार होना चाहती है। शिविर में ५० से कम उम्र वालों को महत्व देने की बात हुई, यह अच्छी बात है, लेकिन हकीकत में वैसा होता नहीं दिख रहा। कांग्रेस में पहले वह होता रहा है, लेकिन बीते कुछ सालों से राजनीति बस गांधी परिवार के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है। शिविर में इस सबसे बड़े सवाल का जवाब नहीं मिला कि पार्टी गांधी परिवार की बैसाखी के सहारे कब तक चलेगी ? अध्यक्ष न सही, कार्यकारी अध्यक्ष तो गैर गांधी परिवार से हो सकता है। कांग्रेस को ऐसे नेता चाहिए जो २४x७ राजनीति करते हों, अपनी गलतियों से सीखकर तुरंत सुधार भी करते हों।
यह सही है कि लोकतांत्रिक देश में ‍मजबूत विपक्ष जरूरी है और यह काम केवल कांग्रेस ही कर सकती है। कांग्रेस मान रही है ‍कि
भाजपानीत राजनीतिक दलों का गठबंधन राजग अब कमजोर हो चुका है। खुद भाजपा अब अहंकारी की भूमिका में आ गई है। ऐसे में दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ ‘यूपीए प्लस’ गठबंधन बन सकता है, जो २०२४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकता है, लेकिन इसके पहले खुद कांग्रेस तो एक दिखे। ये भी तब होगा, जब कांग्रेस मुद्दे तय करने की‍ स्थिति में आए। अभी तो वह केवल प्रतिक्रिया देने या प्रत्यारोप लगाने के किरदार में ही ज्यादा दिखती है। मतदाता के बदलते मानस को समझना होगा। भाजपा ने हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, क्रोनी पूंजीवाद, साम्प्रदायिकता, गरीब हितैषी योजना, व्यापक विकास और दंबगई से अपनी बात रखने का जो सूत्र-तरीका तैयार किया है, उसकी काट पुराने औजारों से नहीं बन सकती। जब तक देश का बहुसंख्यक मतदाता कांग्रेस को फिर से नहीं अपनाएगा, तब तक ज्यादा कुछ कामयाबी नहीं मिल सकती। बहुसंख्यक हिंदुओं का विश्वास फिर से जीतना ही कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। इस बारे में गहराई से चिंतन और अमल हो तो ज्यादा अच्छा है।

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