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कितना बदला जम्मू-कश्मीर…

राधा गोयल
नई दिल्ली
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“ऐसे टकटकी लगाए क्या देख रहे हो काका ?”
“बेटे! वह देख थोड़ी-सी दूरी पर ही पीओके की नीलम वैली। हमारे देश का मुकुट। नदी के एक ओर हमारा ये केरन गाँव है। श्रीनगर से १६५ किलोमीटर दूर है। आज के दिन ही अनुच्छेद ३७० हटा था। आज पूरे ४ साल हो गए हैं। तुझे मालूम है, उत्तरी कश्मीर के इस क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने बीते साल बॉर्डर टूरिज्म शुरू किया ?”
“हाँ काका! यह तो मुझे मालूम है, पर आप किस सोच में डूबे हुए हो ?”
“बेटा! यहाँ से करीब १३० किलोमीटर दूर बालाकोट है, जहाँ भारतीय सेना ने ‘एयर सर्जिकल स्ट्राइक’ करके आतंकी कैंप ध्वस्त किए थे। हमारे इस केरन गाँव ने दुश्मनों की बहुत गोलियाँ झेली हैं।”
“क्या इसीलिए अब हर घर में बंकर हैं ?”
“हाँ बेटा, २ साल पहले तो सेना ने कम्युनिटी बंकर बनाया, पर कभी इस्तेमाल नहीं हुआ। इस गाँव में करीब २०० परिवार हैं। हर घर का कोई ना कोई पीओके में है।”
“अब मुझे आपका दर्द समझ में आया काका कि, आप उधर टक-टकी लगाकर क्या देख रहे हो। आप तो ७७ साल के हो चुके हो। आपने तो बहुत कुछ देखा होगा ?”
“हाँ बेटा! इतने सालों ने क्या-क्या नहीं देखा! बहुत कुछ देखा।” बुजुर्ग बोले। “१९८६-८७ में यहाँ आतंक का दौर शुरू हुआ और पाकिस्तान से आतंकी हमारे गाँव में घुस आए। गाँव वाले उनके बहकावे में आकर उस पार चले गए। उन्हें रोकने की काफी कोशिश की, पर संगीनों के साये में किसकी चलती है।” कहते-कहते उनकी आवाज भरा गई। थोड़ा संभल कर फिर बोले-“करीब १ हजार लोग गए होंगे। चोटी की तरफ इशारा करते हुए बोले- “ऊपर १० हजार की आबादी वाला हमारा गाँव था। पूरा गाँव उनके बहकावे में आ गया और चला गया। आज उस गाँव में सेना के अलावा कोई नहीं है। सारे घर खाली पड़े हैं। वहाँ पाक की तरफ रईस लोगों ने होटल और गेस्ट हाउस बना लिए हैं। बांध के जरिए पानी का बहाव हमारे केरन गाँव की ओर कर रहा है और हमारी जमीनों को बहा रहा है।”
“उसे ऐसा करने से क्या मिल जाएगा काका ?”
“उसे चाहे कुछ ना मिले, पर कुछ लोगों की आदत होती है ना-‘हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे’, लेकिन फिर भी हम लोगों ने हालातों से लड़कर जीना सीख लिया है। अब तो यहाँ पर्यटन भी शुरु हो चुका है। उससे तस्वीर काफी बदल गई है। अब तो लोग यह सोचने लगे हैं कि, नए होम स्टे, होटल और टेन्ट सिटी कैसे शुरू करें। कई लोगों ने तो अपना घर ही होम स्टे में बदल दिया है। घर की महिलाएँ किचन संभालती हैं। वीकेंड में इतने सैलानी आते हैं कि, क्या बताऊँ। हमारे अपने घर में पिछले वीकेंड में २६ मेहमान थे। घरों में जगह नहीं मिली तो लोग मस्जिदों में रुक गए। गाँव में १०० घरों में होम स्टे की सुविधा है। हर घर में औसत १६ लोगों की क्षमता है। १५० से ज्यादा टेन्ट भी हैं। असल में सैलानी पता है, क्यों आते हैं ?”
“क्यों आते हैं इतने सैलानी काका ?”
“अरे! एक तो कश्मीर वैसे ही बहुत सुंदर है। इसे ‘धरती का स्वर्ग’ कहते थे। ऊपर से ठंड और बसंत में यहाँ की खूबसूरती अतुलनीय होती है। पाइन ट्री से लक-दक पहाड़ियाँ सफेद चादर में लिपट जाती हैं। नदी का पानी नीला दिखता है।”
“इसीलिए इसे ‘नीलम वैली’ कहते हैं क्या ?”
“हाँ। और तुम्हें मालूम है, इन दिनों नदी के दोनों तरफ भारत-पाक के सैलानी घूमने आते हैं। डांस करते हैं। ‘आई लव यू’ और ‘ऑल इज वेल’ के नारे लगाते हैं। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि, पर्यटन शुरू होने से इतना बदलाव आया है कि वीकेंड पर जगह नहीं बचती है तो लोग पोस्ट ऑफिस में भी सो जाते हैं। ४ साल की शांति के बाद हम सुकून की नींद ले रहे पा रहे हैं। अब महसूस हो रहा है कि, जन्नत कैसी होती है।” कहकर काका ने आँखें मूँदकर गहरी सन्तोष भरी साँस भरी।