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कुदरत से ही खेल रहे…

ओम अग्रवाल ‘बबुआ’
मुंबई(महाराष्ट्र)
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कैसे-कैसे हुए प्रदूषण,कैसे हम सब झेल रहे हैं,
निजी स्वार्थ में जाने क्यूँ हम,कुदरत से ही खेल रहे हैं।
वायु प्रदूषण देखा हमने,और प्रदूषित जल देखा,
बीज जो हमनें बोए थे अब,आज उन्हीं का फल देखा।
नई-नई बीमारी देखी,नए-नए उपचार दिखे,
कहीं-कहीं तो सचमुच ही हम,बिलकुल ही लाचार दिखे।
दोष बदलते मौसम का तो,केवल एक बहाना है,
अपराधी हम स्वयं रहे हैं,बोलो कब ये माना है।
कहीं बाढ़ का तांडव है तो,कहीं सूखती नदियां हैं,
क्षणिक स्वार्थ का दंश झेलती,जाने कितनी सदियाँ हैं।
मत समझो केवल कुदरत का,संसार प्रदूषित होता है,
कुटिल भाव से खुद अपना व्यवहार प्रदूषित होता है।
करुणा और दया हो मन में,नेह-स्नेह का सागर हो,
मधुरिम वाणी में भी अपनी,सुचिता सत्य उजागर हो।
सकल चराचर से भी हम सब,अपनों- सा व्यवहार करें,
पशु-पक्षी या तरु-तरुवर को,सत्य हृदय से प्यार करें।
सबके सुख में अपना सुख है,मानें इस परिपाटी को,
नमन करें हम भारत को हम,नमन करें इस माटी को।
वरना दीप बुझा-सा समझो,कहाँ तिलों में तेल रहे हैं,
निजी स्वार्थ में जाने क्यूँ हम,कुदरत से ही खेल रहे हैं॥

परिचय-ओमप्रकाश अग्रवाल का साहित्यिक उपनाम ‘बबुआ’ है।आप लगभग सभी विधाओं (गीत, ग़ज़ल, दोहा, चौपाई, छंद आदि) में लिखते हैं,परन्तु काव्य सृजन के साहित्यिक व्याकरण की न कभी औपचारिक शिक्षा ली,न ही मात्रा विधान आदि का तकनीकी ज्ञान है।आप वर्तमान में मुंबई में स्थाई रूप से सपरिवार निवासरत हैं ,पर बैंगलोर  में भी  निवास है। आप संस्कार,परम्परा और मानवीय मूल्यों के प्रति सजग व आस्थावान तथा देश-धरा से अपने प्राणों से ज्यादा प्यार है। आपका मूल तो राजस्थान का झूंझनू जिला और मारवाड़ी वैश्य है,परन्तु लगभग ७० वर्ष पूर्व परिवार उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में आकर बस गया था। आपका जन्म १ जुलाई को १९६२ में प्रतापगढ़ में और शिक्षा दीक्षा-बी.कॉम.भी वहीं हुई है। आप ४० वर्ष से सतत लिख रहे हैं।काव्य आपका शौक है,पेशा नहीं,इसलिए यदा-कदा ही कवि मित्रों के विशेष अनुरोध पर मंचों पर जाते हैं। लगभग २००० से अधिक रचनाएं आपने लिखी होंगी,जिसमें से लगभग ७०० का शीघ्र ही पाँच खण्डों मे प्रकाशन होगा। स्थानीय स्तर पर आप कई बार सम्मानित और पुरस्कृत होते रहे हैं। आप आजीविका की दृष्टि से बैंगलोर की निजी बड़ी कम्पनी में विपणन प्रबंधक (वरिष्ठ) के पद पर कार्यरत हैं। कर्नाटक राज्य के बैंगलोर निवासी श्री  अग्रवाल की रचनाएं प्रायः पत्र-पत्रिकाओं और काव्य पुस्तकों में  प्रकाशित होती रहती हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-जनचेतना है।