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कोई नहीं यहाँ पीने वाला

रत्ना बापुली
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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दूर क्षितिज से उतरी वह, भूली-भटकी सी बाला,
लिए हाथ में दीप शिखा, वह जला रही थी ज्वाला।
सजा हुआ था अधरों पर, अमृत घट का प्याला,
भरी हुई थी आँखों में उसके, जीवन ज्योति निराला॥

देख रही थी वह मतवाली, हर कोई था मतवाला,
पीने की चाह थी सबको, पर कोई न पिलाने वाला।
साग्रह खड़ी थी पिलाने को, वह भोली-सी सुर बाला,
पी रहे थे सभी यहाँ, पर नहीं कोई पीने वाला॥

छोड़ सभी सुस्वादु रस, प्यार का अदभुत प्याला।
देशी पी रहे थे सब, जीवन में विष घोलने वाला।
तिल-तिल कर मर रहे थे, जो था न मरने वाला,
अमृतमय प्रेम त्याग, सब पी रहे थे हाला॥

पी-पी कर झूम रहे थे, मतवाले पर मतवाला,
समझाए कौन उन्हें, जो न थे समझने वाले।
कल इसका क्या क्या होगा, और क्या है होने वाला,
जिसमें उसने जगति का हर रंग है भर डाला॥

प्रेम रस बनाया जिसने सब रसों से न्यारा,
माटी के बेमोल तन भी अनमोल बना डाले।
असहाय खड़ी वह बुला रही थी बहा अमृत की धारा,
भूल उसे ये दीवाने, क्यों पीते वासना का प्याला॥

पर बंद नशे में आँखें उनकी, देख रही थी सुरबाला,
छल-छल करता छलक रहा था आँखों का मधुजाम।
पर अनजान सभी से दीवाने, पीते प्याले पर प्याला,
मिला कभी जो सच्चा नर, अच्छा पीने वाला॥

इन मोह चक्रों ने उस पर ऐसा घेरा डाला,
छोड़ अमृत घट, प्यासे अधर का प्याला।
चला गया वह वही राह, रसातल जो जाने वाला,
बीत गया था बसंत यौवन का, पतझड़ था आने वाला॥

कल की चाह में बीत गया कल, कल फिर जाने वाला,
आज भी नहीं दिख रहा था कोई ऐसा पीने वाला।
सूख रहे थे अधर सुहाने, बीत रहा था पल सारा,
जगति का हर सुख, इसी रस में भरने वाला॥

भ्रमित हो रहा है अब तक, मधु ये पीने वाला,
भूल चुका वह मंत्र पुराना सब दु:ख हरने वाला।
भूल सके कैसे इस दु:ख को, जो खींच गई थी रेखा,
एक यही है प्रेम का प्याला और यही प्रेमी बाला॥

खड़े-खड़े कलान्त तन उसका, दे रहा था धोखा,
देख दशा पीने वालों की प्रेममयी वह बाला।
बिखरा दिया हाथों से अपने अमृत घट का प्याला,
छोड़ इस माया जग का मोह, चली गई वह बाला॥

पर कहती गई वह जग मानव से बात यही अलबेली,
मोह नशा टूटेगा जब, तब पाओगे मुझको ही पास।
मैं लिए सुराही खड़ी रहूँगी, जब तक न तू जागने वाला,
प्यास नहीं बुझ पाएगी, पियो चाहे प्याले पर प्याला॥

सुरा नहीं देगी वह तुमको, नाम दिया जिसे सुरबाला,
केशों के नागपाश में, बांध लिया जिसने तुमको।
मुक्त नहीं हो पाओगे, जीवन जब तक है प्यारा,
तन को लोलुप बनाकर चलती है जो बाला॥

आँखों के बाणों से बिंध कर वो जलाती है आला,
उसके क्षणिक आकर्षण में आहुति क्यों दे डाली।
पलक बिछाए हर पल तुम्हारी, बाट जोहूँगी मैं तीरे,
जीवन के मान-सम्मान में क्यों लगाया टीका काला॥

विदा लिए इस माया जग से, आओगे जब अदृश्य शरीरे,
खुली रहेगी गेह हमारी, वैसे ही अमृत बरसाने वाली।
अनमोल हीरे-सी देह उसकी, बन माटी की पुतली,
सजा रही होगी सुंदरी, अमृत की वह मधुशाला॥

प्रतीक्षारत नैन कमल-से पथरा गए थे उसके,
अधरों पर थी प्यास और हाथों में था रीता प्याला।
कोई ना आया था अब तक सच्चा पीने वाला,
सोच रही थी खड़ी-खड़ी वह मानव मन कितना काला॥

पीते हैं सब घूंट जहर का, मधुजाम समझने वाला,
पीने वाले पीने का मद हरदम भरते आए।
पर पीना किसको कहते है जान न पाए मतवाले,
इन सबसे अनजान कि कल क्या है होने वाला॥

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