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क्या खोया,क्या पाया!

श्रीमती चांदनी अग्रवाल
दिल्ली
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विश्व सौहार्द दिवस स्पर्धा विशेष….

‘कोरोना’ काल में कई परिवारों ने अपनों को खोया है। किसी ने माता-पिता को,तो किसी ने अपनी संतान को खोया है। कुछ परिवार कोरोना की चपेट में आए,परंतु धीरे-धीरे स्वस्थ हो गए।
बात उन परिवारों की करें,जो कोरोना से पूर्णत: बचे रहे। आप क्या सोचते हैं क्या यह परिवार पूर्ण रूप से स्वस्थ है ? क्या यह पूरी तरह खुश है या मानसिक रूप से स्वस्थ है?
इस कोरोना काल में किसने क्या खोया,क्या पाया यह एक बहुत ही कठिन प्रश्न है।
बच्चों ने अपना विद्यालय,शिक्षक और मित्र विद्यालय के दूसरे क्रियाकलाप जैसे-खेल, वाचनालय छोटी-छोटी प्रतियोगिताएं। इन सबसे बच्चों का चौमुखी विकास होता है। इन सबमें बच्चों ने सबसे ज्यादा अपना विद्यालय,टिफिन,छुट्टी का घंटा,बस-वैन-ऑटो रिक्शा में बैठना,वह मस्ती सब कुछ खोया है।
इस सबके बाद यदि किसी के जीवन में पूर्व से पश्चिम तक परिवर्तन आया है तो वह है गृहिणी,एक पत्नी के जीवन में। अब शालिनी को ही लो,उसके पति सुबोध पेशे से चिकित्सक हैं। दोनों की शादी को लगभग २० वर्ष हो चुके हैं। जबसे दोनों की शादी हुई है,तब से दो काम दोनों हमेशा एकसाथ करते थे। एक सुबह की चाय एकांत में पीना,दूसरा शाम को साथ में सैर पर जाना। दोनों के २ बच्चे- बड़ी लड़की महाविद्यालय के प्रथम वर्ष में और बेटा छठी कक्षा में है। दोनों के बीच में यह अंतर होने से दिनचर्या बहुत ही व्यस्त रहती है। जब बच्चे छोटे थे, तभी से सुबोध शालिनी के साथ में चाय पीते थे। कभी-कभी नौकरी के कारण छोड़ भी देते थे। यह जोड़ा साथ में सैर-सपाटा करने के लिए प्रसिद्ध था। सुबोध ने ही शालिनी को यह दोनों आदतें डाली थी।
पिछले मार्च २०२० में जो कोरोना की महामारी आई,तब से आज तक शालिनी ने दोनों काम सुबोध के साथ करना बंद कर दिए। बच्चों के विद्यालय और महाविद्यालय बंद होने के कारण बच्चों की ऑनलाइन कक्षा की अब पूरी जिम्मेदारी शालिनी पर ही आ गई थी।
सुबोध की जीवनचर्या कोरोना काल में वैसे ही चल रही है,जैसी पहले चल रही थी। वही दफ्तर,वही सबके साथ लंच और चाय,परंतु शालिनी अब अपने छोटे बेटे की मम्मी,उसकी शिक्षक और दोस्त हो गई है। इन सबके अलावा बाजार जाना,घर के सारे काम करना शालिनी की ही जिम्मेदारी थी। अब शालिनी अकेले ही सैर पर निकलती है। अजनबी लोगों में अपने किसी परिचित को ढूंढती है। शालिनी को सुबोध के साथ चाय और सैर पर बिताया समय अक्सर याद आता है। उसे पति के साथ रहकर ऊर्जा मिलती थी,जिससे वह पूरे दिन खुशी-खुशी पूरे परिवार का ध्यान रखती थी,लेकिन यह सब दूसरों की अपेक्षा कुछ नहीं। फिर भी कहना चाहूंगी कि इस समय शालिनी जैसी कई महिलाएं हैं,जो मानसिक रूप से कभी-कभी स्वयं को कमजोर महसूस करती है।
हमें अपने जीवन की कमी को याद ना करके अपने समय को रचनात्मक कार्यों में लगाना चाहिए,जैसे- संगीत,पढ़ने-लिखने की आदत,बागवानी आदि। जब भी हमें अपने जीवन में कुछ कमी लगे,तब हमें हमारे पास कितना कुछ है,उसी पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। अपनी योग्यता और ऊर्जा को सही जगह पर उपयोग करने का विचार करना चाहिए।