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क्रांतिकारी धर्मगुरु व राष्ट्र निर्माता रहे स्वामी दयानन्द सरस्वती

ललित गर्ग
दिल्ली
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जन्म जयन्ती-१२ फरवरी विशेष…

स्वामी दयानन्द सरस्वती ऐसे दिव्य महापुरुष हैं, जिन्होंने समाज-सुधार एवं आडम्बर मुक्ति का आलोक ही नहीं फैलाया, बल्कि राष्ट्र-निर्माण में अपूर्व योगदान दिया। उनकी कीर्ति किसी एक युग तक सीमित नहीं है। उनका लोकहितकारी चिन्तन त्रैकालिक, सार्वभैमिक एवं सार्वदेशिक है और युग-युगों तक समाज का पथदर्शन करता रहेगा। स्वामी दयानंद सरस्वती प्रकाश स्तंभ है। जिस युग में उन्होंने जन्म लिया, उस समय देशी-विदेशी प्रभाव से भारतीय संस्कृति संक्रमण के दौर से गुजर रही थी और उसका पतन आरंभ हो गया था। उन्होंने भयाक्रांत, आडम्बरों में जकड़ी और धर्म से विमुख जनता को अपनी आध्यात्मिक शक्ति और सांस्कृतिक एकता से संबल प्रदान किया। वे उन महान संतों-महापुरुषों में अग्रणी हैं जिन्होंने देश में प्रचलित अंधविश्वास, रूढ़िवादिता, विभिन्न प्रकार के आडंबरों व सभी अमानवीय आचरणों का विरोध किया। वे आधुनिक भारत के महान् चिन्तक, समाज सुधारक, क्रांतिकारी धर्मगुरु व देशभक्त थे। हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने, स्वदेशी जागरण तथा हिंदू धर्म के उत्थान व इसके स्वाभिमान को जगाने हेतु स्वामी जी के महत्वपूर्ण योगदान के लिए भारतीय जनमानस सदैव उनका ऋणी रहेगा।
स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म १२ फरवरी सन् १८२४ में काठियावाड़ क्षेत्र (जिला राजकोट) में टंकरा नामक स्थान पर हुआ था। दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था और उनका प्रारम्भिक जीवन बहुत आराम से बीता। आगे चलकर एक पण्डित बनने के लिए वे संस्कृत, वेद, शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्ययन में लग गए। उनके हृदय में आदर्शवाद की उच्च भावना, यथार्थवादी मार्ग अपनाने की सहज प्रवृत्ति, मातृभूमि को नई दिशा देने का अदम्य उत्साह, धार्मिक-सामाजिक-आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से युगानुकूल चिन्तन करने की तीव्र इच्छा तथा भारतीय जनता में गौरवमय अतीत के प्रति निष्ठा जगाने की भावना थी। उन्होंने किसी के विरोध तथा निन्दा की परवाह किए बिना हिन्दू समाज का कायाकल्प करना अपना ध्येय बना लिया था। महर्षि दयानंद ने इतने व्यापक क्षेत्रों में कार्य किया है कि, अनेक क्षेत्र हमारी आँखों से ओझल ही रह जाते हैं। राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए उनके महान योगदान पर अभी हमारी दृष्टि नहीं पड़ी है। संसार उनको एक धार्मिक महापुरुष के रूप में ही जानता है, जबकि वे सशक्त राष्ट्र-निर्माता भी हैं। भारत को स्वतंत्रता दिलाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्वदेशी आंदोलन के मूल सूत्रधार भी महर्षि दयानंद ही थे। उन्होंने लिखा है- ’जब परदेशी हमारे देश में व्यापार करेंगे तो दारिद्रय और दुःख के बिना दूसरा कुछ भी नहीं हो सकता।’
स्वामी दयानंद सरस्वती ने मुम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। उन्होंने वेदों की सत्ता को सदा सर्वोपरि माना। स्वामी जी ने कर्म सिद्धान्त, पुनर्जन्म, ब्रह्मचर्य तथा संन्यास को अपने दर्शन के ४ स्तम्भ बनाया। उन्होने ही सबसे पहले ‘स्वराज्य’ का नारा दिया, जिसे बाद में लोकमान्य तिलक ने आगे बढ़ाया। सत्यार्थ प्रकाश के लेखन में उन्होंने भक्ति-ज्ञान के अतिरिक्त समाज के नैतिक उत्थान एवं समाज-सुधार पर भी जोर दिया उन्होंने समाज की कपट वृत्ति, दंभ, क्रूरता, अनाचार, आडम्बर, एवं महिला अत्याचार की भर्त्सना करने में संकोच नहीं किया।
स्वामी दयानन्दजी के जीवन में ऐसी बहुत सी घटनाएं हुईं, जिन्होंने उन्हें हिन्दू धर्म की पारम्परिक मान्यताओं और ईश्वर से जुड़ी भ्रान्त धारणाओं को बदलने के लिए विवश किया। अपनी छोटी बहन और चाचा की हैजे के कारण हुई मृत्यु से वे जीवन-मरण के अर्थ पर गहराई से सोचने लगे और वे १८४६ में सत्य की खोज में निकल पड़े। गुरु विरजानन्द ने उन्हें पाणिनी व्याकरण, पातंजलि-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा-विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत-मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। यही तुम्हारी गुरुदक्षिणा है।
महर्षि दयानन्द ने अनेक स्थानों की यात्रा की। उन्होंने हरिद्वार में कुंभ के अवसर पर पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई। उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किए। वे कलकत्ता में बाबू केशवचन्द्र सेन तथा देवेन्द्र नाथ ठाकुर के संपर्क में आए। केशवचन्द्र सेन ने स्वामी जी को यह सलाह दे डाली कि, यदि आप संस्कृत छोड़ कर हिन्दी में बोलना आरम्भ करें, तो देश का असीम उपकार हो सकता है। तभी से स्वामी जी ने हिन्दी में उपदेश देना प्रारंभ किया, इससे विभिन्न प्रान्तों में उन्हें असंख्य अनुयायी मिलने लगे।
आंतरिक आवाज वही प्रकट कर सकता है जो दृढ़ मनोबली और आत्म-विजेता हो। दयानन्द ने बुद्धिवाद की जो मशाल जलाई थी, उसका कोई जवाब नहीं था। वे जो कुछ कह रहे थे, उसका उत्तर न तो मुसलमान दे सकते थे, न ईसाई, न पुराणों पर पलने वाले हिन्दू पण्डित और विद्वान। हिन्दू नवोत्थान अब पूरे प्रकाश में आ गया था। अनेक समझदार लोग मन ही मन अनुभव करने लगे थे कि, वास्तव में पौराणिक धर्म की पोंगापंथी में कोई सार नहीं है। इस तरह धर्म के वास्तविक स्वरूप से जन-जन को प्रेरित करके उन्होंने एक महान् क्रांति घटित की। उनकी इस धर्मक्रांति का सार था कि न तो धर्मग्रंथों में उलझें और न ही धर्म स्थानों में। उनके धर्म में न स्वर्ग का प्रलोभन था और न नरक का भय, बल्कि जीवन की सहजता और मानवीय आचार संहिता का ध्रुवीकरण था।
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने न केवल धर्मक्रांति की, बल्कि परतंत्रता में जकड़े देश को आजादी दिलाने के लिए राष्ट्रक्रांति का बिगुल भी बजा दिया। क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना भी स्वामी जी के नेतृत्व में ही तैयार की गई थी और प्रमुख सूत्रधार भी थे। वे अपने प्रवचनों में श्रोताओं को प्रायः राष्ट्रवाद का उपदेश देते और देश के लिए मर मिटने की भावना भरते थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज सशक्त भारत-नए भारत की बात कर रहे हैं, इसके बीज स्वामी जी ने अपने समय में डालते हुए कहा- ’एक धर्म, एक भाव और एक लक्ष्य बनाए बिना भारत का पूर्ण हित और उन्नति असंभव है।’ स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सशक्त, आजाद एवं शक्तिशाली भारत को निर्मित करते हुए आर्य समाज के माध्यम से समाज-सुधार के अनेक कार्य किए। छुआछूत, सती प्रथा, बाल विवाह, नर बलि, धार्मिक संकीर्णता तथा अन्धविश्वासों के विरुद्ध उन्होंने जमकर प्रचार किया और विधवा विवाह, धार्मिक उदारता तथा आपसी भाईचारे का उन्होंने समर्थन किया। उनकी जन्म जयन्ती मनाने की सार्थकता तभी है जब हम उनके बताए मार्ग पर चलते हुए गुणवत्ता एवं जीवनमूल्यों को जीवनशैली बनाएं।

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