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खामोशी कहती है…

डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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खामोशी भी कुछ कहती है,
जो शब्द नहीं कह पाती है
छुपा खजाना शब्दों का ये,
शब्द भी मौन रखा करती है।

कभी करती इनकार खामोशी,
कभी इकरार किया करती है
कभी अपनों को पास बुलाती,
कभी दूर भी किया करती है।

बनते काम बिगाड़ती है ये,
बिगड़ता काम सवांरती है
जो शब्द नहीं कह पाती है,
खामोशी भी कुछ जाती है।

कभी-कभी खामोशी बहुत,
वाचाल भी हुआ करती है
कोई जौहरी ही इसे समझे,
जिसे समझ हुआ करती है।

कभी खामोशी दर्द छुपाए,
शब्दों के बाण सहा करती
औरों को कुछ दर्द ना हो,
खुद खामोश रहा करती है।

खामोशी जीवन में कभी,
एकांकीपन भी ला देती है
शब्द अगर खामोश हुए,
तो नासूर भी बना देती है।

दिल में कोई गाँठ ना आए,
रिश्तों पर आँच ना आए
शब्द तो कुछ नहीं कहती,
खामोशी भी कुछ कहती है।

कभी खामोशी प्यार बढ़ाती,
कड़वे शब्द बोल ना पाती है।
खुद का दर्द छुपाए दिल में,
दूसरों पर प्यार लुटाती है॥

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