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खुद पहचान बनाना है…

रश्मि चौधरी ‘रिशिमा’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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सुबह-सुबह अख़बार में लड़ाकू विमान की महिला पायलट की तस्वीर देखकर मन प्रसन्न हो गया…। महिलाएँ कितनी आत्मविश्वासी और स्वावलंबी होती जा रही हैं…। आज महिलाओं द्वारा भी बड़े-बड़े कार्यों की जिम्मेदारी ली जा रही है। महिलाओं द्वारा सभी क्षेत्रों में कदम बढ़ाये गए हैं। पुरुषों के मुकाबले में कहीं महिलाएँ पीछे नहीं हैं,अर्थात महिलाएँ सशक्त हो रही हैं।
अख़बार के अगले ही पन्ने पर बलात्कार की खबर पढ़कर फिर कहीं हृदय में वेदना हो उठी। मैं एक बार फिर सोचने पर मजबूर हो गई…। बार-बार मन में यही प्रश्न आते हैं,क्या सच में महिलाएं सशक्त हो रही हैं ? क्या महिला सशक्तिकरण हो रहा है ? पर ये सशक्तिकरण क्यों आवश्यक है ?
अपनी निजी स्वतंत्रता और खुद फैसले लेने के लिए महिलाओं को अधिकार होना ही महिला सशक्तिकरण है। अब सवाल यह उठता है कि क्या महिला सशक्तिकरण सम्भव है ? हाँ…है तो परंतु इसके लिए महिलाएं खुद अपने-आपको हर तरह से सक्षम बनायें और दूसरों की निर्भरता की सोच से बाहर आएँ। खासकर हमारे पिछड़े तबके और पारंपरिक ग्रामीण समाज की महिलाएँ,जो अपनी इच्छा शक्ति, स्वतंत्रता और स्वाभिमान को दबाकर जीने के लिए मजबूर हैं। समाज में अपने पैर ज़माने के लिए चारदीवारी से बाहर निकल कर आएं और अपनी पहचान बनाएं। प्राचीन समय से आज तक अपनी सभ्यता,संस्कृति, परम्पराओं को निभाने के लिए हर जगह अपने को कमतर आंकती महिलाओं को आगे आना ही होगा। आज भी महिलाओं को दरवाजे के पीछे धकेलने वालों की कमी नहीं है।
अब सवाल यही है कि,समाज में महिलाओं का सशक्त होना कितना आसान है और कितना कठिन ? कई बार लगता है कि स्त्री घर की लक्ष्मी होती है लेकिन घर के बाहर क्या ? हर जगह वह तर्क-कुतर्क और विकृत मानसिक लोगों की शिकार होती है, हिंसा की शिकार होती है,लांछित होती है। आज सशक्तिकरण के माध्यम से ये सब सोचकर इन समस्याओं को समाज से उखाड़ फेंकने की जरुरत है।
इसी तरह हमारी महिलाओं को भी समझना होगा कि बस परिधान और केश सज्जा बदलने से हम सशक्त नहीं कहलाएंगी। सशक्तता का परिचय महिलाओं को पहनावे या दिखावे से नहीं करना है। महिलाओं को अपने दृढ़ संकल्प,साहस और आत्मविश्वास से सशक्त होना है। आज महिलाएं भी समाज में सम्मान पाना चाहती हैं तो उन्हें भी समझना होगा कि,सम्मान के लिए समर्थ बनना आवश्यक है और बिना आत्मविश्वास के यह संभव नहीं है। अब समय आ गया है कि,महिलाएंँ समाज में अपना स्थान बनाएंँ,स्वयं भी आगे बढ़ें,राष्ट्र निर्माण में अपना सहयोग दें और अपने परिवार,समाज के लिए भी रोशनी से भरा मार्ग प्रशस्त करें। आज समूचे विश्व में महिला सशक्तिकरण की बात हो रही है और हो भी क्यों ना ?? महिलाओं के सशक्त होने से परिवार,समाज और राष्ट्र निर्माण में अभूतपूर्ण परिवर्तन आता है,क्योंकि महिलाएँ प्राकृतिक रूप से बहुत ऊर्जावान व ऊष्मावान होती हैं। आवश्यकता है बस उनकी थोड़ी और कोशिशों की। आज महिलाओं से यही कहना चाहती हूँ-
“तुम ममता की मूरत हो,
साहस की अवतारी हो।
तुम्हीं अहिल्या माता हो,
वक़्त पड़े झलकारी हो॥”

परिचय–श्रीमती रश्मि चौधरी का साहित्यिक नाम ‘रिशिमा’ है। १९७४ में ३० अगस्त को इंदौर में जन्मीं हैं। वर्तमान में इंदौर(मध्यप्रदेश)में ही निवास है। आप बी.एड. एवं एम.ए. तक शिक्षित होकर कार्यक्षेत्र में शासकीय शिक्षक हैं। इनकी लेखन विधा-लेख,कहानी तथा कविता है। रचनाओं का प्रकाशन विभिन्न अखबारों में हो चुका है। बात सम्मान की करें तो इंदौर में महापौर द्वारा,रोटरी क्लब द्वारा एवं दैनिक पत्र से लेखन में राज्य स्तरीय सम्मान प्राप्त किया है। आपकी विशेष उपलब्धि शिक्षक प्रशिक्षक, अंतर्राष्ट्रीय आंग्ल भाषा शिक्षक कार्यशाला में सहभागिता करना है। रिशिमा की लेखनी का उद्देश्य-आज के परिवेश में शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर अपने विचार जन-जन तक पहुँचाना है।