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खेल भावना के आगे सब कुछ गौंण

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर(राजस्थान)
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२३ वर्षीय खिलाड़ी नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलिम्पिक में भाला फेंक स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का एथलेटिक्स में ओलिम्पिक पदक जीतने का पिछले १०० साल से भी अधिक का इंतजार समाप्त कर दिया। इस जीत से नीरज चोपड़ा ने न केवल इतिहास रचा,बल्कि हमारे राष्ट्र को भी गौरवान्वित किया है। अतः हृदय स्वत: ही स्वभाविक तौर से बधाई देता है। स्वर्ण पदक जीतने के बाद उसने इसे महान धावक मिल्खा सिंह को समर्पित कर अद्भुत खेल भावना प्रकट की है। इस भावना के लिए भी ये निश्चित तौर पर बधाई के पात्र हैं।
यह दिन भी हम सभी के लिए बहुत ही गौरव वाला है,क्योंकि पहली बार हमारे राष्ट्र भारत के लिए ७ पदक अभी तक जीत (अभी तक ओलिम्पिक में ६ पदक तक ही जीत)लिए गए हैं।
खेल भावना की जब बात करते हैं ध्यान में एक अनोखी घटना इस प्रकार है-
यह दृश्य टोक्यो ओलिम्पिक में पुरुषों की ऊंची कूद के फाइनल का है। स्पर्धा के फाइनल में इटली के २९ वर्षीय गियानमार्को टम्बेरी और कतर के ३० वर्षीय मुताज एशा बरशीम ने लगभग ७ फुट ९ इंच की छलांग लगाई और बराबरी पर रहे ! दोनों को एक-दूसरे पर बढ़त बनाने के लिए २.३९ मीटर की छलांग पूरी करनी थी,इसलिये ओलिम्पिक अधिकारियों ने उनमें से प्रत्येक को ३-३ अतिरिक्त प्रयास के अवसर दिए,लेकिन दोनों ही अधिक ऊंचाई की छलांग नहीं लगा पाए। यानि ३ प्रयासों के बाद भी कोई भी खिलाड़ी निर्धारित ऊंचाई तक पहुंच नहीं सका। इसके बाद दोनों को एक अंतिम प्रयास और दिया गया,लेकिन टम्बेरी के पैर में गंभीर चोट के कारण उन्होंने स्वयं को अंतिम प्रयास से अलग कर लिया। उस समय जब बरशीम के सामने कोई दूसरा प्रतिद्वंदी नहीं था,तब वे आसानी से अकेले स्वर्ण पदक विजेता बन सकते थे! तब बर्शिम ने अधिकारी से पूछा,-‘अगर मैं भी अंतिम प्रयास से पीछे हट जाऊं तो क्या स्वर्ण पदक हम दोनों के बीच साझा किया जा सकता है ?’
आधिकारी ने जाँच के बाद पुष्टि करते हुए कहा,-‘हाँ तो स्वर्ण पदक और प्रथम स्थान आप दोनों के बीच साझा किया जाएगा।’ बर्शिम ने बिना एक पल गंवाए अंतिम प्रयास से हटने की घोषणा कर दी। यह देख इटली का प्रतिद्वन्दी टम्बेरी दौड़ा और बरसीम को गले लगाने के बाद चीख-चीख कर रोने लगा।
बर्शिम ने भले ही स्वर्ण पदक साझा कर लिया हो, लेकिन इंसानियत के तौर पे वे बहुत आगे निकल गए और खेल की इस दुनिया में अपना नाम अमर कर लिया।
यह दृश्य हमारे दिल को छूने वाला और अद्भुत खेल भावना प्रकट करने वाला है जो धर्मों,रंगों और सीमाओं को बहुत बौना बना देता है। सौहार्द और आपसी साहचर्य ही मानवता की कसौटी है। इसलिए ही कहा जाता है कि खेल के मैदान से अच्छा भावनाओं को जोड़ने का कोई स्थान नहीं है।

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