रचना पर कुल आगंतुक :2028

You are currently viewing खोज नया उजियास

खोज नया उजियास

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार ‘अजस्र’
बूंदी (राजस्थान)
**************************************************

‘अजस्र’ किरपा गणेश की,
सारों सगरे काम।
वाणी, मात-पिता सहित,
लियो राम का नाम॥

‘अजस्र’ शक्ति उस देवी से,
सीता सत का नाम।
कलम-मसी करते रहें,
वीणापाणि प्रणाम॥

‘अजस्र’ बली तुम पवन से,
शंकर-सुवन प्रणाम।
‘सवा-शतक’ सृजनन करूं,
आगे तेरा काम॥

धंवला-लक्ष्मी गतिक भी,
ज्ञान-धनन असमान।
इक जाती लागे भली,
सूरत ‘ अजस्र ‘ प्रणाम॥

भरत-राम के प्रेम-सा,
जग में कहीं न पाय।
माता बन क्यों बावली,
‘अजस्र ‘ द्वेष पनपाय॥

राम यदि चाहो घर में,
दशरथ बनकर देख।
‘अजस्र’ राम बिन मर गए ,
पिता-पुत्र समरेख॥

‘अजस्र’ साँचाइ राम है,
झूठा जग का नाम।
राम-राम सब जपत चले,
बनते बिगड़े काम॥

‘अजस्र’ माने त्रिदेव सम,
तैतीस कोटि देव।
अंश सभी में एक है,
परम आत्मा सदैव॥

‘अजस्र’ अवतारी गुम गए,
काली-काली छाँह।
गौर वर्ण भी डरा रहे ,
कलंक न लगे माँह॥

‘अजस्र’ तिरंगा क्यों झुके,
डेड अरब की शान।
हिन्द-हिंदी सह अमर रहे,
तेरे सभी निशान॥

‘अजस्र’ आस्था इतनी रख,
ईश कृपा बरसाय।
माया मो फंद छूट क,
भवसागर तर जाय॥

‘अजस्र’ युग-युग बीतते,
युग काला है आज।
धर्म-अधर्म, पुण्य-पाप में,
काला कागा काज॥

‘अजस्र’ काला कीचड़ हुआ,
मारे बड़ी सड़ांध।
साफ तभी हो पायगा,
कीचड़-कीचड़ माँज॥

‘अजस्र’ कसौटी सत्य सभी,
कलयुग पार न पाय।
आटा फीका स्वाद बिना,
थोड़ा नमक मिलाय॥

मिथ्या धुंध है फैल रही,
छिप गया सत्यप्रकाश।
‘अजस्र’ सूरज कल सत्य का,
उदय होय आकाश॥

‘अजस्र’ कंगुरा कब बने,
चमचे लाख हजार।
नींव दफन हो जायगा,
कौन किसे दरकार॥

‘अजस्र, माया विज्ञापनो,
मत ना तु भरमाय।
हरा-हरा सब दीखता,
पाय, रेत ही पाय॥

नो दिनों के नवरात्रे,
‘अजस्र’ शक्ति पनपाय।
दोहा इक-इक मोती सा,
सृजन तु करता जाय॥

फ़ौज-रावणों देखकर,
‘अजस्र’ रह गया दंग।
चलो राम पनपाय हम,
सत्य-विजय करें जंग॥

खा-पीकर भंडार भरा,
‘अजस्र’ समृद्ध विकास।
कदम-कदम चलता चले,
उगता सूरज पास॥

‘अजस्र’ सुधर तु बहुत गया,
अब नवीन कुछ सीख।
ऐड़े, पेड़े खा रहे,
तू क्यों मांगे भीख॥

‘अजस्र’ अन्न सब किसान का,
धरती दाता नाम।
इंसा तू क्यों लड़ रहा,
भली करें अब राम॥

‘अजस्र’ शरम को छोड़कर,
जीवन आनंद कर।
चार पल इस जीवन के,
पल-पल रहा गुजर॥

‘अजस्र’ दूध तो दूध है,
काली गाय सफ़ेद।
पी ज्ञान उसी अमृत को,
मेटे सारे भेद॥

‘अजस्र’ अकेला तू नहीं,
साथ तेरे कइ संग।
कदम-कदम बढ़ते चले,
जमता रहे फिर रंग॥

‘ अजस्र ‘ खोना सीखे ले ,
खोना सब एक दिन।
दुनिया है रोती रहे,
बढ़े कारवाँ ‘जिन’॥
(जिन-जितेंद्रीय)

‘अजस्र’ जीवन दु:ख किसका,
तेरा क्या जो लाय।
हाथ खोल जीवन उड़ा,
देख तु उसकी सहाय॥

सुंदर चोला ओढ़ कर,
कागा बन गया हंस।
‘अजस्र’ आप घर देख लिय,
शरमा जाए कंस॥

पहिये, गाड़ी दंपती,
परिवार भर सामान।
‘अजस्र’ समान चलते रहें ,
जीवन सुख-मन मान॥

‘अजस्र’ उधार की बानगी,
देख के मन भरमाय।
लेते, जी, जी, जी हुजूर,
देवत, मनन फटाय॥

‘अजस्र’ गर्मी बहुतो लगे,
ठंडा पानी पीय।
दुनियाँ तपती रेत-सी ,
तु मस्त मगन बस जीय॥

‘अजस्र’ गैली दुनिया में,
समझदारी तू रख।
जोत जलाइ परमात्मा,
उसके प्रेम को चख॥

‘अजस्र’ खारी जुबान मत,
मीठी बड़ी अनमोल।
नमक पानी जो मिल गया,
कितनी हि शक्कर घोल॥

‘अजस्र’ कहना क्या चाहे,
न समझे, पाए जग।
नीली दुनिया नील-सी,
नील-सा दिखता नभ॥

‘अजस्र’ दुखिया जग कोई,
नाम विधाता लेव।
जीवन सुख-दु:ख टोकरी,
दु:ख-सुख एकवमेव॥

‘अजस्र’ समझो बातों को,
यह जग अजब दुकान।
मीठा-मीठा बिक गया,
बच गया कड़वा पान॥

‘अजस्र’ स्वारथ-तुच्छ कारण,
न मन मर्यादा रोल।
पर दु:ख कातर जगत बन,
देखो बजन्ता ढोल॥

‘अजस्र’ माया-मानन में,
मन को मत रोलाय।
मान गया मन कलप गया,
माया गई रुलाय॥

‘अजस्र’ दुनिया मतलब की,
मतलब से ही काम।
नमक, मिश्री सब जगत में,
बाकि नाम ही नाम॥

‘अजस्र’ मक्खी बन शहद की,
कण-कण जोड़ती छत्त।
मानव बड़ा है स्वार्थी,
अपना भी नहीं, धत्त॥

‘अजस्र ‘ वनस्पति हरी है,
लाल ढाक के पात।
जिसका जैसा गुण रहा,
वैसा उसका गात (शरीर)॥

‘अजस्र’ जाति बीरादरी,
ऊंच-नीच नहीं सम।
जिसकी जहां गरज है,
कोई नहीं है कम॥

‘अजस्र’ खेल यह तेल का,
चार पहिय दौड़ाय।
तेल तेरा ज हुआ खत्म,
चार कंधे फिर पाय॥

वो जाने उस भाग्य को,
‘अजस्र’ न जाने पाय।
भूत गया, अब चल रहा,
भावी भविष्य बताय॥

‘अजस्र’ गीत तू रच रहा,
दुनिया सुने इक दिन।
याद तुझे कर रोयगी,
बिछड़ेंगे जिस दिन॥

‘अजस्र’ लक्ष्य संभाले रहा,
घन-चक्र अभिमन्यु मीन।
भवसागर जो तर गया,
चमक उठे उस ‘दीन’॥

‘अजस्र’ दोहा त तेज है,
समझ ज समझे जान।
काम सरे जो ले लिए,
बाकी पड़े दुकान॥

‘अजस्र’ आनंद गोविन् ज्यों,
मन से भजता नाम।
चुगली-जन चमचे बने,
तेरा ना अब काम॥

‘अजस्र’ निंदा से न बचे,
न बच पाय भगवान।
बस तु करम पर ध्यान दे,
आगे भाग्यविधान॥

‘अजस्र’ छोटे कदम से ही,
बालक चले संभल।
लंबी-लंबी तू दौड़ता,
पांव न जाए फिसल॥

‘अजस्र’ गरीब भी जिय रह,
जैसे जिए अमीर।
एक ‘ऐश’ ही घुल रहा,
एकन ऐश’ करीर॥
( ऐश-राख, ऐश’-एशो-आराम )

‘अजस्र’ सोच कर सोच लिय,
साथ नहीं कुछ जाय।
फिर भी मन मृगतृष्णा,
मिटी! कोई बताय॥

‘अजस्र’ काम को बोझ समझ,
दुःखी बहुत है जन।
काम संग आनंद किय,
खुश हो तन् और मन॥

‘अजस्र’ डर तो डर ही है,
शेर, सांप या भूत।
डर से उबर जो तु गया,
लक्षित पहुंचे अकूत॥

‘अजस्र’ दबी हुइ बात को,
शब्दों से ना कुरेद।
राज खुले दिल दूखता,
बोले से मनभेद॥

‘अजस्र’ सूखे पेड़ों की,
माया बड़ी अजीब।
घर-जरूरत सब सध रही,
फैशन नई करीब॥

‘अजस्र’ चोरी ने रोक लो,
मोती है अनमोल।
कागा कइ जो चुग रहे,
पहन हंस के खोल॥

‘अजस्र’ बड़े समाजों में,
नाम का मत ना रह।
कड़वी भले पर बोल दे,
जनों पीड़ा, कुछ कह॥

‘अजस्र’ अंधेरा जगत में,
मन के नैना खोल।
आँखे हो, न ही सूझता,
कानों में रस घोल॥

प्रेम भरा परिवार है,
‘अजस्र’ सकल संसार।
प्रेम की बेलि सींच ले,
महिमा अपरंपार॥

मन की खिड़की खोल ले,
‘अजस्र’ नजारा लेय।
रंग-बिरंगे जगत में,
सब रंगों, तू स्नेय॥

‘अजस्र’ लोग तो बूझते,
अजस्र, अजस्र, यह कौन ?
डी. कुमार मनो आस्था,
आगे वो भी मौन॥

‘अजस्र’ चलत संसार की,
गति समझे ना कोय।
जैसे पवन है खेलती,
जैसे बहता तोय॥

‘अजस्र’ बैठ क्या सोचता,
पल-पल बने उदास।
खुश हो जीवन फूल से,
जी, कुल मन उल्लास॥

‘अजस्र’ अंधेरी रात में,
नींद कभी खुल जाय।
उठा कलम लिख डाल तू,
नए-इ-नए अध्याय॥

‘अजस्र’ जीवन के मार्ग में,
चढ़ा-उतार सब साथ।
उठा पांव, रख हौंसला,
मंजिल तेरे पास॥

‘अजस्र’ आध मिलती रहे,
पूरी भले न पाय।
रहे मन संतोष तेरा,
चार गुनी हो जाय॥

‘अजस्र’ तमन में सूझता,
मन के नैन हजार।
उसकी राह चलत चले,
पाता जाए प्यार॥

‘अजस्र’ सपन भी चल रहे,
नींद भले हो अंग।
कलम तेरी में जागृति,
देख लोग हैं दंग॥

‘अजस्र’ अंधड़ों राह से,
खोज नया उजियास।
जो भी तुझको सूझता,
मेटे ज्ञान की प्यास॥

‘अजस्र’ साया चराग का,
घर अंधेरा बाकि।
घनी-काली रात बहुत,
अभी सवेरा बाकि॥

‘अजस्र’ अजस्र सब ही करे,
‘अजस्र’ न समझे कोय।
जो जग हृदयों में बसा,
एक रूप वो होय॥

छाया जो सुख स्वप्नों की,
‘अजस्र’ ना पाछे पड़।
भूत-अतीत के कारणे,
वर्तमान ना लड़॥

‘अजस्र’ रजनियाँ चाँदनी,
गुजर गई बिसराय।
काली रात अमावस की,
दीपक चलो जलाय॥

‘अजस्र’ साबुन-शैंपू से,
तन-सिर धोए जाय।
मन विवेक से रीत गया,
तब बुद्धि रही बिल्माय॥

‘अजस्र’ एक तू ही नहीं,
दुनिया मंद हजार।
मोती-मोती सृजन कर,
बहे ज्ञान की धार॥

तुझ से बर्बाद कई है,
‘अजस्र’ जगत के माय।
मातम छोड़, तु लक्ष्य सजा,
अर प्रयास दौड़ाय॥

प्रेशर कहीं, कोई हो,
लड़ना है बेकार।
प्रेशर हटे ताकत दिखा,
‘अजस्र’ बेड़ा फिर पार॥

‘अजस्र’ कचरा मन में भरा,
मल-मल तन को धोय।
साबुन-तेल की महक में,
मत ना जीवन खोय॥

चाटू-चपल-चकोरों से,
‘अजस्र’ संभल् कर चल।
पीठ-पीछे प्रहारते,
तेरा बिगाड़े कल॥

नौकर राज में कइ हैं,
लघु कोइ, कोइ वृहद।
‘अजस्र’ बड़ा जो बन गया,
पार करता क्यों हद॥

‘अजस्र’ राज त चला गया,
राजतंत्र क्या काम।
जनता सब है देखती,
कर दे काम तमाम॥

‘अजस्र’ रोना सीख लई,
हँसी मना सभ्य राज।
हँसे जो पागल बने,
इन तंत्र क्या काज॥

‘अजस्र’ गरज के कारणे,
घर तेरे जो आय।
महल तेरा यूं इ खड़ा,
बोलो क्या ले जाय॥

‘अजस्र’ तु निजी स्वारथ में,
क्यों अंधा है होय।
चोरी इक या लाख की.
फरक नहीं है कोय॥

सेवक-सेवक सब करे,
सेवा का ना भाव।
‘अजस्र’ मौका ज मिल गया,
बनते सब उमराव॥

‘अजस्र’ मरन को छोड़ दिया,
गइया-मइया पूज।
भूख-लम्पी-लट्ठ पड़ रहे,
मरने तक भी जूझ॥

‘अजस्र’ आग-आतंक से,
जलता रहा जो जग।
कुछ नहीं बच पाएगा,
आग बढ़े जो हद॥

तुच्छ संकीर्ण इ प्रेम में,
‘अजस्र’ प्रेम ना तोड़।
आत्मा कष्ट में रोयगी,
जीवन दिय जो छोड़॥

‘अजस्र’ रिश्वत के खेल में,
भ्रष्टों-माल-गोदाम।
भांग कुए में घुल रही,
करे नियामक ध्यान॥

जय-भीम, भीम ‘अजस्र’ करे,
‘भीम’ समझ ना पाय।
भीम-वाद के कारण ही,
भीम, भीम कहलाय॥

‘अजस्र’ भीम आदर करे,
लेकर भीम विचार।
कोरे भीम के नाम पर,
करे क्यों लोग प्रचार॥

‘अजस्र’ हिंदु घर जन्म लियो,
हिंदु कहे कहलाय।
धरम सनातन एक ही,
नाम है कइ बताय॥

‘अजस्र’ रिश्ते सब अजब हैं,
अपने-अपने नाम।
गरज गए सब गूजरे,
किसका क्या अब काम॥

‘अजस्र’ सलोना तू बहुत,
‘काला’ ही पहचान।
काला मन मत राखिजो,
सारा जग अवमान॥

‘अजस्र’ देखे सूरत को,
सीरत देख न पाय।
काले-गोरे फेर में,
जग जाता भरमाय॥

‘अजस्र’ अपनी तु सुन जरा,
दूजों पर ना ध्यान।
बोलें सभी खुद-अक्ल से,
तु भी ज्ञानी सुजान॥

‘अजस्र’ मुस्करा, जीवन जी,
काहे मुँह लटकाय।
स्वर्ग-नरक सब बाद में,
आया है सो जाय॥

‘अजस्र’ जमीर जगाय ले,
ज्ञानों पट को खोल।
मन में खुदइ प्रकाश कर,
पीछे जिह्वा खोल॥

‘अजस्र’ विचारों समुद में,
गोता रोज लगाय।
मोती-मोती सृजन करे,
पनडुब्बा कहेलाय॥

‘अजस्र’ सवाया ही भला,
रहे बधिक ने ठौर।
कमतर बस खुरचन करें,
बढ़े जीव सिरमौर॥

‘अजस्र’ देख जग नीतियां,
मन-इ-मन उहापोह।
नव-रंग नव-विचार से,
करता वो सममोह॥

प्रलोभनों दुनिया भरी,
‘अजस्र’ तु मन समझाय।
बंधे जीव् सब पेट से,
पेट सभी करवाय॥

रोजी हराम-हलाल की,
सोच विचार तू कर।
‘अजस्र’ प्रतिफल मिली रहे,
मन काहे कोइ डर॥

‘अजस्र’ राज के कारणे,
सिल ले तु यह जुबान।
कीचड़ छींटे जो पड़े,
हो जाए बदनाम॥

‘अजस्र’ तीखा उदरों में,
गड़बड़ बड़ी मचाय।
पर भोजन तीखे बिना,
स्वाद नहीं ला पाय॥

‘अजस्र’ चुपके तु जो करे,
जग सब देखे तोय।
भल अंधेरा बहुत है,
कभी उजाला होय॥

‘अजस्र’ बूंदें गिर रही,
प्रेमरस सराबोर।
जाका तन-मन् भीग रहा,
प्रेम के गोताखोर॥

‘अजस्र’ बत्तियां जलाय ले,
अंधियारा घनघोर।
इक टमीका बस तेरा,
बाकी ओर न छोर॥

‘अजस्र’ काया खोखलयी,
हाड-मास बस नाम।
तोड़ पिंज उड़ जाय तो,
माटी का क्या काम॥

‘अजस्र’ पदमा कारण से,
नागमती बिसराय।
जिसकी ऐसी धारणा,
चैन कहाँ से पाय॥

मूंग, मूंग से ना बड़ा,
‘अजस्र’ समझ ले बात।
सबसे अलग जो दीखता,
दिखती फिर औकात॥

‘अजस्र’ देग फिर पक गया,
इक चावल के हाल।
परखी सब है समझता,
बानगी का ही कमाल॥

‘अजस्र’ पंखा चलत रहा,
तीन पंखुड़ी साथ।
भावी, भूत बस नाम का,
वर्तमान चले साख॥

सुख के बीते चार पल,
‘अजस्र’ स्वप्न मत रोल।
बस छाया ही रह गई,
अब तो अखियां खोल॥

‘अजस्र’ प्रेम क्या चीज है,
मरने तक ले आय।
जिनो प्रेम बहुवचन-सा,
उनको क्यों बिसराय॥

‘अजस्र’ बेटी लाडकड़ी,
माता का वह मान।
जीवन यौवन पहुंचते ,
कौन पराया, जान॥

‘अजस्र’ सोते जगत में,
सपनों का संसार।
नींद खुली सपने खत्म,
कैसा, कौन का प्यार॥

‘अजस्र’ रासा जगती का,
वो ही समझे एक।
नदियां क्षण भर, भर गई,
चटख धूप अब देख॥

‘अजस्र’ झिंगुर, मिल बोलते,
अपनी टेर लगाय।
अपनी दुनिया चल रही,
कोय कितना चिल्लाय॥

नमक, चीनी के खेल म,
गौरा, गौरी झख्ख।
‘अजस्र’ दोनों मिलन गए,
सभी स्वाद तब फख्ख॥

घर की बेटी लक्ष्मी,
प्रेम अति वो पाय।
‘अजस्र’ जो घर छोड़ दिया,
बहु क्यों तड़पे जाय॥

‘अजस्र’ राम के हेत में,
तु जीवन जीय जाय।
दुनिया में फल बहुत है,
जो मन चाहे पाय॥

‘अजस्र’ संत बन राम-सा,
राम् के रूप अनेक।
मरा-मरा भी राम बने,
राम-राम रट देख॥

‘अजस्र’ देव बस एक है,
‘ मालिक’ जिसका नाम।
ब्रह्मा से ब्रह्मांड बना,
करता-धरता राम॥

छोड़ो शर्म को मुखर बनो तुम ,
बोलो हृदय के सब उद्गार।
आसमान भी लगेगा छोटा,
उन्मुक्त उड़ोगे जब पंख पसार॥

पनडुब्बे से तुम बन जाओ,
अथाह सागर में गोत लगाओ।
मोती ज्ञान के अतुल खजाना,
सृजन करो ‘अजस्र’ श्रृंगार॥

परिचय–आप लेखन क्षेत्र में डी.कुमार ‘अजस्र’ के नाम से पहचाने जाते हैं। दुर्गेश कुमार मेघवाल की जन्मतिथि १७ मई १९७७ तथा जन्म स्थान बूंदी (राजस्थान) है। आप बूंदी शहर में इंद्रा कॉलोनी में बसे हुए हैं। हिन्दी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा लेने के बाद शिक्षा को कार्यक्षेत्र बना रखा है। सामाजिक क्षेत्र में आप शिक्षक के रुप में जागरूकता फैलाते हैं। लेखन विधा-काव्य और आलेख है,और इसके ज़रिए ही सामाजिक मीडिया पर सक्रिय हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-नागरी लिपि की सेवा,मन की सन्तुष्टि,यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ प्राप्ति भी है। २०१८ में श्री मेघवाल की रचना का प्रकाशन साझा काव्य संग्रह में हुआ है। आपकी लेखनी को बाबू बालमुकुंद गुप्त साहित्य सेवा सम्मान आदि मिले हैं।

Leave a Reply