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गहन चिंतन व परिपक्वता देती हैं कथा पुस्तकें-प्रो.(डॉ.) खरे

कथा सम्मेलन….

मंडला(मप्र)।

कथा-पुस्तकों के पाठक तो घटे हैं, लेकिन आज भी कथा-पुस्तकें लिखी जा रही हैं,पढ़ी जा रही हैं,पर पाठकों में कथाएं पढ़ने में वैसी मनोयोगता,लगन व गंभीरता नहीं है,जैसी पहले होती थी,पर यह भी सही है कि कथा-पुस्तकों से जो चिंतन,वैचारिकता व संदेश पाठक तक पहुंचता है, वह लघु कथाओं या अन्य लघु साहित्य से कदापि भी संभव नहीं है। वैसे आज भी कथा-पुस्तकों के पाठक हैं,और आगे भी रहेंगे।
यह विचार मंडला (मप्र) के सुपरिचित लेखक प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे ने विशिष्ट अतिथि के रूप में भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वावधान में ऑनलाइन कथा सम्मेलन में व्यक्त किए। मुख्य अतिथि नीलम नारंग (पंजाब)ने कहा कि,कथा साहित्य हमेशा से ही समाज का आईना रहा है। पंचतंत्र की कथाओं के माध्यम से सबने नैतिक शिक्षा ग्रहण की है। कथा पुस्तकें दूरदर्शिता को बढ़ावा देती हैं। इनकी प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी।
इस सम्मेलन में संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने कहा कि,आरंभिक काल से ही कथाकारों द्वारा कथा सृजन की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। कहानियां कल्पनाशीलता को बढ़ाती हैं।
सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए ‘पथिक’ रचना (नैनीताल) ने कहा कि,आज तकनीक चाहे कितनी भी विकसित हो गई हो,सस्ते दामों में ई-पुस्तक उपलब्ध भले हो,किंतु यह व्यवस्था पढ़ने का सार और अनुभव करने का आनंद छीन लेती है। व्यक्तित्व के निर्माण में भी कथा पुस्तकों की अहम भूमिका रही हैं। हम बच्चों के हाथों में मोबाइल के बदले अच्छी कथा पुस्तकें थमाएं। पढ़ी गई कहानी पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि,नीलम नारंग के विचार एवं उनकी कहानी ‘बचपन’ बहुत सारगर्भित है। आपने अन्य रचनाओं पर भी टिप्पणी की। सम्मेलन में पढ़ी गई ५ कहानियों को देशभर के दर्शकों ने सुना और विचार व्यक्त किए।

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