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गुरु नहीं, जीवन शुरू नहीं

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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गुरुपूर्णिमा विशेष….

प्रत्येक मानव को ही शिक्षा के लिए शिक्षक की जरुरत होती है। वास्तव में मानव बहुत कमज़ोर प्राणी होता है, बनिस्बत पशुओं के। पशु जन्म के कुछ समय बाद अपने बल पर चलने-फिरने,दौड़ने लगता है। न उसे कोई सिखाता है, वह अपने अनुभव से सीखता जाता है। मनुष्य के जन्म के समय से उसके लालन-पालन में बहुत ध्यान रखना पड़ता है और उसकी प्रथम शिक्षक माँ होती है। धीरे-धीरे उसके ऊपर पिता,भाई-बहिन,परिवार का प्रभाव पड़ता है उसके बाद विद्यालयीन शिक्षा में उसके ऊपर शिक्षक का प्रभाव पड़ता है। यह बहुत कच्ची उम्र होती है, इस समय उसमें सबसे अधिक ग्रहणशीलता होती है, और वह प्रत्येक कृत्य बहुत सूक्ष्म या कुशाग्र बुद्धि से ग्रहण कर करता है या कर लेता है। इस समय शालेय शिक्षा का प्रभाव बहुत गहरा होता है। शाला में सभी प्रकार के बच्चे आते हैं, उनसे वह बहुत जल्दी बुराईयां सीखता है और अप्रत्य़क्ष में गुरु या शिक्षक का प्रभाव उस पर पड़ता है।
विद्यालय और महाविद्यालयीन शिक्षा के असर-प्रभाव से ही उसकी नींव-आधार-दिशा तय होती है। इसी बिंदु से उसकी दिशा और दशा तय होती है। वह नौकरी, व्यवसाय आदि क्षेत्रों में जाता है और किसी को अपना आदर्श मानता है। विशेष कर धार्मिक व सामाजिक क्षेत्र में तो एक गुरु की जरुरत नितांत होती है। जीवन मूल्यों के रखरखाव के साथ जब वह समस्यायों से घिर जाता है, तब उसे चक्रव्यूह की तरह किसी मार्गदर्शक की जरुरत पड़ती है। उस समय वह गुरु की खोज के पहले गुरु की परीक्षा लेता है और गुरु शिष्य की परीक्षा लेते हैं। जब शिष्य में समर्पण भाव, निष्ठा भाव आता है तो वह देखता है कि गुरु सम्मान, अपार ज्ञान, शुचिता और दृढ़ चरित्र के कारण अंगीकार करता है।
शिष्य-गुरु परम्परा बहुत प्राचीन और सृमद्धशाली थी और आगे भी रहेगी। वर्तमान में तो गुरुओं की बहुलता है। शिष्य वह होता है, जो गुरु के चरणों में स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर दे या अर्पण कर दे। ऐसा शिष्य,जिसकी सारी इच्छाएं गुरु के विश्वास पर समर्पित हो जाए। जो अपने अंतर में दृढ हो और अपनी महत्वाकांक्षाओं का त्याग कर गुरु की आज्ञा और सलाह को फूल की तरह शिरोधार्य करे। वैसे, शिष्य की परीक्षा गुरु इस प्रकार लेते हैं-उसमें कितनी मानवीय संवेदनाएं हैं। सेवा या श्रमदान आत्मिक विकास एक लम्बी प्रक्रिया है, इसमें समय लगता है। यह समय ही अनुभव की कसौटी होती है। गुरु आज्ञा का पालन बिना किसी तर्क या शंका के करना पड़ता है या चाहिए। शिष्य को आज्ञा पालन में प्रसन्नता, पवित्रता और संतोष का भाव होना चाहिए और गुरु आज्ञा को ईश्वर आज्ञा मानता है।
जिसके अंतर में ज्ञान की प्यास जग उठती है, उसे ही सच्चे गुरु की आत्मिक प्यास होती है। गुरु के सम्मुख उसका अहंकार तिरोहित हो जाता है।यह दुनिया दुखों का संसार है, इससे तरने के लिए गुरु की ही जरुरत है, जो हमारा हाथ पकड़ कर हमें उस लोक में पहुंचा दे। यह सब गुरु कृपा से ही संभव होता है। ज्ञान उसी को मिलता है, जिसके मन में श्रद्धा होती है।
गुरु न केवल एक शिक्षक है, मार्गदर्शक है, हर पथ पर हमारा संरक्षक है। इस प्रकार गुरु का वर्णन ईश्वर के वर्णन के समान है।
हर समय गुरुओं का समादर माँ-पिता से ऊपर रहा है। राजा का उपकार सांसारिक होता है, पर गुरु का उपकार तीनों लोक के उद्धार के लिए होता है। सब जीव गुरु होने की पात्रता रखते हैं, बस जरुरत हैं शुचिता ,श्रेष्ठ समर्पण की और अपनी अज्ञानता को उजागर करने की, जिससे ज्ञान का बोध मिल सके।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।