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गुलामी की मानसिकता बस

संजय एम. वासनिक
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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हिन्दी और हमारी जिन्दगी…

दो दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात…
क्यों करते हैं भाई, हम राष्ट्र भाषा की बात…।

भूल जाओ इसे, होगा यही बेहतर…
नहीं तो कैसे जा पाएंगे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर…।

बच्चों को फिर भारत में ही पढ़ाना पडेगा,
अमेरिका जाने के सपने से तुम्हें हाथ धोना पड़ेगा।

आजकल तो हम हिंदी भी अंग्रेजी में लिख लेते हैं…
जब काम चल जाता है तो क्यों हिंदी सीखते हैं…

क्यों नहीं चाहते हो हमारी भाषा की उन्नति…
बताओ कहाँ थम गई चीन, जापान की प्रगति…।

क्यों हमें हमारी भाषा की कोई फिक्र नहीं…
गुलामी की मानसिकता बस, स्वसम्मान का जिक्र नहीं…।

कब होगी हमारी अंतरआत्मा से मुलाकात…
कोसों दूर है खुद से, मातृभाषा की छोड़ो बात…।

भूला चुके संस्कृत और पाली को कब का…
हिंदी को भी एक दिन तुम भुला जाओगे…।

ए हिंदुस्थानी पूत तुम सिर्फ़ विदेशियों की नकल कर पाओगे…
श्रेष्ठ वांड़्गमय रचयिता के कुलवंश, तुम बंदर बनकर रह जाओगे…।

यदि अपने-आपसे अपनी भाषा में है संवाद…
तो क्यूँ करना है हिंदी की श्रेष्ठता का विवाद…॥