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चर्म देह वस्त्र दिया

संदीप धीमान 
चमोली (उत्तराखंड)
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चर्म देह वस्त्र दिया
भीतर मल के ढेर को,
मर्म दिया अस्त्र रुप
अहम मन के फेर को।

अर्थ दिया गृहस्थ को
धर्म दिया मनुष्य को,
कर्म को सत्कर्म दिया
ध्यान छल के हेर को।

व्यर्थ संग अनर्थ पला
गरल संग गर्द गला,
अमृतपान आत्म का
देह मात्र हेर-फेर को।

स्वार्थ को संबंध चले
देह मात्र बस बंध डले,
तदर्थ ज्ञान लाभ को
शव मात्र इश घेर को।

देह पात्र अंग भरे,
अर्थ हर अंग धरे।
रुप उर नहीं कोई,
प्रणाम उस, उर के फेर को॥

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