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चलनी की खोज

संजय वर्मा ‘दृष्टि’ 
मनावर(मध्यप्रदेश)
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करवा चौथ विशेष…

करवाचौथ के दिन पत्नी सज-धज के पति का इंतजार कर रही कि, शाम को घर आएंगे तो छत पर जाकर चलनी में चाँद-पति का चेहरा देखूँगी। पत्नी ने गेहूँ की कोठी मे से धीरे से चलनी निकाल कर छत पर रख दी थी। चूँकि, गाँव में पर्दा प्रथा की परंपरा होती है, साथ ही ज्यादातर काम सास-ससुर की सलाह लेकर ही करना, संयुक्त परिवार में सब का ध्यान भी रखना और आँखों में शर्म का पर्दा भी रखना होता है। पति को बुलाना हो तो पायल, चूड़ियों की खनक के इशारों या खाँस कर या बच्चों के जरिए ही खबर देना होती है।
करवा चौथ के दिन की बात है, पति घर आए तो साहित्यकार के हिसाब से वो पत्नी से मिले। कविता के रूप में करवा चौथ के अवसर पर पत्नी को कविता की पंक्ति सुनाने लगे-“आकाश की आँखों में /रातों का सूरमा /सितारों की गलियों में /गुजरते रहे मेहमां/ मचलते हुए चाँद को/कैसे दिखाए कोई शमा/छुप-छुपकर जब/ चाँद हो रहा हो जवां।”
कविता की पंक्ति और आगे बढ़ती, इसके पहले माँ की आवाज अंदर से आई-“कहीं टीवी पर कवि सम्मेलन तो नहीं आ रहा! शायद मैं टी.वी. बंद करना भूल गई होंगी!, मगर लाइट अभी ही गई और मैं तो लाइट का इंतजार भी कर रही हूँ, फिर यहाँ आवाज कैसी आरही! फिर आवाज आई-आ गया बेटा !”
बेटे ने कहा-हाँ माँ, मैं आ गया हूँ।”
अचानक लाइट भी आ गई।
उधर, सास अपने पति का चेहरा देखने के लिए चलनी ढूंढ रही थी, किन्तु चलनी तो बहू छत पर ले गई थी, और वो बात सास-ससुर को मालूम न थी। जैसे ही पत्नी ने पति का चेहरा चलनी में देखने के लिए चलनी उठाई, तभी नीचे से सास की आवाज आई-“बहू, चलनी देखी क्या ? गेहूँ छानना है।”
बहू ने जल्दीबाजी कर पति व चाँद का चेहरा देखा और कहा-“लाई माँ।”
पति ने फिर कविता की अधूरी पंक्ति बोली- “याद रखना बस/इतना न तरसाना/मेरे चाँद तुम खुद/मेरे पास चले आना..” इतना कहकर पति भी पत्नी की पीछे-पीछे नीचे आ गया।
सासू माँ, ससुर को ले कर छत पर चली गई।अचानक सासू माँ को ख्याल आया कि, लोग बाग क्या कहेंगे, लेकिन प्रेम और आस्था उम्र नहीं देखती। जैसे ही ससुर का चेहरा चलनी में देखने के लिए सास ने चलनी उठाई, अचानक बहू ने मानो जैसे चौका जड़ दिया।वो ऐसे-नीचे से बहू ने आवाज लगाई-“माजी आपने चलनी देखी क्या ? आप गेहूँ मत चालना, मैं चाल दूंगी।” ये बात सुनकर चलनी गेहूँ की कोठी में चुपके से कब आ गई, कानों- कान किसी को पता भी न चला, मगर ऐसा लग रहा था कि चाँद ऊपर से सास-बहू के चलनी खोज का करवाचौथ पर खेल देख कर हँस रहा था। मानो जैसे कह रहा था कि मेरी भी पत्नी होती, तो मैं भी चलनी में अपनी चाँदनी का चेहरा देखता…।

परिचय-संजय वर्मा का साहित्यिक नाम ‘दॄष्टि’ है। २ मई १९६२ को उज्जैन में जन्में श्री वर्मा का स्थाई बसेरा मनावर जिला-धार (म.प्र.)है। भाषा ज्ञान हिंदी और अंग्रेजी का रखते हैं। आपकी शिक्षा हायर सेकंडरी और आयटीआय है। कार्यक्षेत्र-नौकरी( मानचित्रकार के पद पर सरकारी सेवा)है। सामाजिक गतिविधि के तहत समाज की गतिविधियों में सक्रिय हैं। लेखन विधा-गीत,दोहा,हायकु,लघुकथा कहानी,उपन्यास, पिरामिड, कविता, अतुकांत,लेख,पत्र लेखन आदि है। काव्य संग्रह-दरवाजे पर दस्तक,साँझा उपन्यास-खट्टे-मीठे रिश्ते(कनाडा),साझा कहानी संग्रह-सुनो,तुम झूठ तो नहीं बोल रहे हो और लगभग २०० साँझा काव्य संग्रह में आपकी रचनाएँ हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में भी निरंतर ३८ साल से रचनाएँ छप रहीं हैं। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में देश-प्रदेश-विदेश (कनाडा)की विभिन्न संस्थाओं से करीब ५० सम्मान मिले हैं। ब्लॉग पर भी लिखने वाले संजय वर्मा की विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-मातृभाषा हिन्दी के संग साहित्य को बढ़ावा देना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद,तो प्रेरणा पुंज-कबीर दास हैंL विशेषज्ञता-पत्र लेखन में हैL देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-देश में बेरोजगारी की समस्या दूर हो,महंगाई भी कम हो,महिलाओं पर बलात्कार,उत्पीड़न ,शोषण आदि पर अंकुश लगे और महिलाओं का सम्मान होL

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