राधा गोयल
नई दिल्ली
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हम सामाजिक प्राणी हैं और समाज का हमारे जीवन में बहुत महत्व है। यदि जीवन में सफल होना और खुशी से भरपूर जीवन जीना चाहते हैं, तो हमें एक-दूसरे से सामंजस्य बनाकर चलना बहुत जरूरी है। फिर चाहे वह हमारा कार्यस्थल हो अथवा घर परिवार, अन्य सम्बन्धी या आस-पड़ोस। संयुक्त परिवार हो अथवा एकल परिवार…, सामंजस्य स्थापित करके संबंध मधुर बने रहते हैं।
केवल अपने लिए सोचना, दूसरों की इच्छाओं की कद्र न करना, सामंजस्य बनाकर न रहने से रोज की तकरार रहती है। बड़ों का आदर, छोटों से स्नेह, छोटी-छोटी बातों को दिल से न लगाना। ससुराल में सास-ससुर को माता- पिता और ननद देवरों को बहन-भाई समझ कर प्यार देना। तकरार हो भी जाए तो उसे दिल से न लगाना। तकरार तो आपस में बहन भाइयों में भी होती है, तो क्या उसे दिल से लगाते हैं ? उसी वक्त भुलाकर फिर खेलने लग जाते हैं। यही बात परिवार में भी होनी चाहिए। “जहाँ चार बर्तन होंगे तो टकराएंगे ही” जब ऐसी सोच होगी तो जीना बड़ा सरल हो जाएगा।
एकल परिवारों में आजकल आपसी सामन्जस्य न होने के कारण तकरार के मामले ज्यादा ही बढ़ रहे हैं। संयुक्त परिवार हो, तो बड़ों के समझाने-बुझाने या शर्म-लिहाज से रिश्ते टिके रहते हैं। एकल परिवार हो तो कौन किसे समझाएगा ? यदि पति-पत्नी दोनों ही नौकरी करते हों तो ऐसे में पत्नी सोचती है… क्या घर का सारा काम करना मेरी ही जिम्मेदारी है! पति को भी उसमें सहयोग करना चाहिए। वह इस बात को आराम से भी कह सकती है, प्यार से भी काम ले सकती है। लेकिन नहीं… दोनों एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं। यदि पत्नी गृहिणी है, तो पति की नजरों में उसकी इज्जत बाई से भी कम होती (कुछ अपवाद छोड़कर) है। पति सोचता है, कि उसकी पत्नी सारा दिन टी.वी. देखती है और आराम करती है। वो दफ्तर में नौकरी करके खटता रहता है। इसी बात को पत्नी को सुनाता भी है। भूल जाता है कि बाई को महीने में ४ छुट्टियाँ मिलती हैं, लेकिन स्त्री गृहिणी हो या नौकरीपेशा… उसे तो अपने जीवन में १ भी छुट्टी नसीब नहीं होती। पति की ऐसी कर्कश बातों से कई बार तो स्थिति इतनी भयंकर हो जाती है कि या तो संवादहीनता की स्थिति आ जाती है या नौबत विवाह विच्छेद तक आ जाती है। दोनों ही यह नहीं सोचते, कि उनकी तकरार और विवाह विच्छेद से बच्चों पर क्या असर होगा। दोनों के आपस में विचार टकराते हैं। यदि संवादहीनता की स्थिति बन जाए, तो दोनों का ‘अहम’ आड़े आता है। वह सोचता है मैं पहले क्यों बोलूँ ? वह सोचती है मैं पहले क्यों बोलूँ ? रिश्तों में इतनी तल्खी आ जाती है कि दोनों को ही लगता है कि रोज रोज की किच-किच की बजाए अलग हो जाना ही बेहतर विकल्प है। वे यह नहीं सोचते, कि इससे बच्चों के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा ? आदमी की तो दूसरी शादी हो जाएगी। शादी पत्नी भी कर लेगी, लेकिन उसके बच्चों को कोई भी स्वीकार नहीं करेगा। कर भी लेगा तो सगे पिता वाला प्यार नहीं दे पाएगा। जो बच्चे पहले से ही पिता से विलग हो चुके हैं, माँ के दूसरा विवाह करने के बाद माँ के प्यार से भी वंचित हो जाएंगे। और क्या भरोसा है, कि दूसरे जीवनसाथी के साथ ऐसा नहीं होगा। सामन्जस्य तो वहाँ भी बनाना पड़ेगा, बल्कि कुछ अधिक ही बनाना पड़ेगा। बेहतर है कि अपने ‘अहम’ को तिलांजलि दे दो। अहम ही है, जो रिश्तों में तनाव व दूरियाँ पैदा करता है।
आजकल की पढ़ी-लिखी और
कमाऊ लड़कियों में अहम की भावना कुछ ज्यादा ही पैदा हो रही है। वो कुछ ज्यादा ही बराबरी की माँग करने लगी हैं।
जो गृहिणी हैं, वो खुद को अबला, अक्षम और पुरुष से कमतर समझती हैं। नहीं जानतीं कि उनका तो पहले से ही पुरुषों से कहीं अधिक ऊँचा दर्जा है। नर के आगे ‘ई’ लगाकर ‘नारी’ बनता है।
कहा गया है-“एक नहीं, दो-दो मात्राएँ नर से बड़ी नारी, जब नर से बड़ी नारी… तो फिर कैसी लाचारी ?”
शिव के आगे से ‘ई’ हटा दिया जाए तो शिव भी शव हो जाता है।
तो शक्ति स्वरूपा गृहिणी क्यों खुद को अबला… अक्षम और पुरुष से कमतर समझती हैं ? आदमी बेवजह बात बात में उसे नीचा दिखाता है और दोनों बेवजह अपने अहम को पाल कर बैठते हैं। होना तो यह चाहिए कि पति-पत्नी या परिवार का कोई भी सदस्य आपस में अहम न पाले। अहम से ही रिश्तों में दरार आती है। जीवन की गाड़ी हँसी खुशी सुचारू रूप से चलती रहे, उसके लिए अहम छोड़ना बहुत जरूरी है। ‘अहम’ और ‘स्वाभिमान’ में अंतर होता है। ‘स्वाभिमान को ताक पर मत रखो, लेकिन अहम को ताक पर रख दो।
ऑफिस में अपने सहकर्मियों के साथ… या बस-ट्रेन अथवा पूरे समूह सहित पर्यटन के लिए जाते समय सहयात्रियों के साथ भी सामन्जस्य बनाकर चलना पड़ता है और बनाना भी चाहिए। ऐसा करने से सफ़र सुहाना हो जाता है। मैंने बीसों बार विभिन्न यात्राओं पर जाते समय ये अनुभव किया। एक बार का कड़वा अनुभव तो ऐसा था कि पूरे सहयात्रियों ने घर पहुँचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, क्योंकि ३ दिन मूसलाधार बारिश में जाम में फँसे रहे। शौच के लिए भी ट्रकों के नीचे जाना पड़ा। ४ हजार ट्रक फँसे पड़े थे। सामन्जस्य के कारण इतने सफर के बाद भी वह सफ़र एक यादगार सफर बन गया।
जरूरी नहीं कि सभी के विचार एक समान हों। विचारों में ‘मतभेद’ बेशक हो, लेकिन ‘मनभेद’ नहीं होना चाहिए।
केवल रिश्तों में ही नहीं, पड़ौसियों के साथ भी हमें सामंजस्य बना कर चलना पड़ता है। अकेले रहते हों, तब तो पड़ोसियों से और भी अधिक सामन्जस्य बनाकर चलना चाहिए, क्योंकि दु:ख-तकलीफ में पहले वही काम आएंगे। सगे-सम्बन्धी तो सूचना मिलने पर आएंगे।