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जी लूं मौत न आने तक

सच्चिदानंद किरण
भागलपुर (बिहार)
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मौत आने का,
इंतजार ही क्यों!

जन्म के साथ जुड़ी है
एक बे-वक्त की कड़ी,
जो जिंदगी के
साथ है और बाद भी,
मौत जो अमूक है
और सचेत भी,
कुछ मौतें अनायास
तो कुछ स्वैच्छिक व,
स्वाभाविक
और कुछ,
शारीरिक व्याधितित रोग
उद्यातन मृत्यु शैय्या पर,
पड़े मौत के इंतजार में।
पर मौत ही नहीं,
कुछ तो पूर्व के कर्मों की
सजा व्यतन और कुछ,
तनिक ठोकर पर
तुनुक से स्वर्गारोही बन चले।

बस मौत आने का,
इंतजार ही क्यों!!

मौत तो सांत्वना भी,
बस यूँ कह जाते हैं-
बड़ों-वृद्ध की मौत
शोक की गहरी छाप नहीं,
पर अल्पायु तो काफी
हृदयविदारक
लम्बे समय तक,
यदि मानविक भूल जाना
नहीं होता तो जीना
नदारत होना तय ही
मौत परम सत्य निश्चित है,
तो ये जीना जियो
खुशियों में आनंदमय हो,
मौत आए तो आए
पीछे छोड़ जाए अमरत्व की
साज-सजावट में,
अपनी सुकर्म-धर्म की
प्रतीक चिन्हों की तरह,
पुनः मौत आने का
इंतजार ही क्यों!!

मन मचलते हैं और
जी लूं मौत न आने तक,
दीर्घायु हो सत्यार्थ के
लिए जब-जब आए,
अनेक आपदाएं घेरे
अंधेरी काली घटाओं के,
ताने-बाने बुन के जीवन को
संतत्प में घिर जाने,
दृढ़ संकल्प से जीना है
तनिक भी दु:ख-दर्द आशाओं
के साथ,
हँस के जी लूं
हर किसी की खुशियों में,
मौत तुझे अनेक नमो नमः
जब भी आना,
ले जाना नर्क या स्वर्ग
मेरा शोक है, मेरे कर्म फलों का,
हँसते खिलते लहलहाते बगिया में।
तो मैं मौत का इंतजार,
ही क्यों करूं ???

परिचय- सच्चिदानंद साह का साहित्यिक नाम ‘सच्चिदानंद किरण’ है। जन्म ६ फरवरी १९५९ को ग्राम-पैन (भागलपुर) में हुआ है। बिहार वासी श्री साह ने इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की है। आपके साहित्यिक खाते में प्रकाशित पुस्तकों में ‘पंछी आकाश के’, ‘रवि की छवि’ व ‘चंद्रमुखी’ (कविता संग्रह) है। सम्मान में रेलवे मालदा मंडल से राजभाषा से २ सम्मान, विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ (२०१८) से ‘कवि शिरोमणि’, २०१९ में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ प्रादेशिक शाखा मुंबई से ‘साहित्य रत्न’, २०२० में अंतर्राष्ट्रीय तथागत सृजन सम्मान सहित हिंदी भाषा साहित्य परिषद खगड़िया कैलाश झा किंकर स्मृति सम्मान, तुलसी साहित्य अकादमी (भोपाल) से तुलसी सम्मान, २०२१ में गोरक्ष शक्तिधाम सेवार्थ फाउंडेशन (उज्जैन) से ‘काव्य भूषण’ आदि सम्मान मिले हैं। उपलब्धि देखें तो चित्रकारी करते हैं। आप विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ केंद्रीय कार्यकारिणी समिति के सदस्य होने के साथ ही तुलसी साहित्य अकादमी के जिलाध्यक्ष एवं कई साहित्यिक मंच से सक्रियता से जुड़े हुए हैं।