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तुम सच बोलो

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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साहित्य सृजन की सजग सृजिके,
प्रिय कलम तुम सच बोलो
सत्ता-समाज के बीच ठनी जो,
निज नोक से राज वे सब खोलो।

पथभ्रष्टों को राह दिखा दो,
अनाचारों से बैर ही मोलो
जाति-धर्म का भांडा फोडो़,
प्रेम उकेरो,जहर न घोलो।

श्रंगार-सागर में इतनी न डूबो,
नव रस पलड़ों में लेख को तोलो
अपनी स्याही के पावन जल में,
विश्व धरा के मैल सब धो लो।

मत बनो यूँ दासी तुम,
सत्ता और रसिक जवानों की
अपनी जु़बां से बयां करो तुम,
कहानी मजलूम इंसानों की।

मजदूरों की मजबूरी लिखो,
पीड़ा लिखो किसानों की
मध्य वर्ग का सहयोग भी लिखो,
शहादत लिखो जवानों की।

सियासत की तुम लड़ाई लिखो,
गफलत लिखो धनवानों की
जनता का हाहाकार लिखो,
अनीति लिखो विधानों की।

सत्य-धर्म का बोध भी लिखो,
सजग हो उठे पुनः जहान।
बिसरी बातें फिर से करो तुम,
चेतन में भर दो नूतन प्राण॥