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दक्षिण में हिंदी विरोधी ये सपोले उत्तर से

डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’
मुम्बई(महाराष्ट्र)
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नेता जो कुछ भी कहते हैं, वह राजनीतिक जमा, घटा या गुणा करके ही कहते या करते हैं। आए-दिन कांग्रेस सहित विपक्षी नेता घुमा-फिरा कर हिंदू धर्म पर ही हमले करते दिखते हैं। इनके द्वारा बाकी किसी धर्म पर ऐसे हमले शायद ही कभी हुए हों। पी. चिदंबरम ने फिर एक बार हिंदुओं के साथ-साथ संसदीय राजभाषा समिति की अपुष्ट रिपोर्ट (जिस पर अभी विचार किया जाना है) को आधार बनाकर फिर हिंदी के विरुद्ध जहर उगला है। ‘गरीब की जोरू सबकी भौजाई’ की तर्ज पर जो चाहे देश की राजभाषा, जिसे स्वतंत्रता सेनानियों ने राष्ट्रभाषा कहा, उस पर विषवमन करने लगता है। और घबराए-डरे कथित हिंदी प्रेमी इधर-उधर की करने लगते हैं। अब समय आ गया है कि, हिंदी और भारतीय भाषाओं के विरोधियों को खुलकर जवाब दिया जाए। भाषा विरोध के नाम पर ‘मत’ बटोरने वालों को कड़ा जवाब दिया जाए।
यह कोई राज की बात नहीं है कि, कांग्रेस ने अपने लंबे शासनकाल में लगातार अंग्रेजी को आगे बढ़ाया और भारतीय भाषाओं को दबाया। जहां भारत में ९९.५ फीसदी से भी अधिक लोग मातृभाषा में ही पढ़ते थे। इन्होंने गाँव-गाँव और नर्सरी स्तर तक अंग्रेजी माध्यम पहुंचा दिया। अंग्रेजों और अंग्रेजी के परम भक्त नेहरू ने तत्कालीन वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन को कहा था ‘आई एम द लास्ट इंग्लिश प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया।’ वे जाते-जाते ऐसी नीतियां बनाते गए कि भारत के लोग धीरे-धीरे भारतीय के बजाय मानसिक तौर पर अंग्रेजों के गुलाम बनते जाएं। कांग्रेस लगातार नेहरू की अंग्रेजी को बढ़ाने और भारतीय भाषाओं को दबाने की नीति पर चलती रही। बाकी रही-सही कसर १९८६ की शिक्षा नीति के माध्यम से राजीव गांधी (जिसकी सरकार की कमान अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया गांधी और उनकी मित्र मंडली के पास थी) ने पूरी कर दी। ईसाइयत के प्रसार के लिए भी यह आवश्यक है कि, भारतीय धर्म, संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान जिनका आधार भारतीय भाषाएँ हैं, वे धीरे-धीरे कमजोर हो कर समाप्त होते चले जाएँ। भारतीय भाषाएँ कमजोर होंगी तो, निश्चित रूप से भारत और भारतीयता और भारत के धर्म भी कमजोर होंगे।
फिर राजीव गांधी के मित्र सैम पित्रोदा ने ज्ञान आयोग के अध्यक्ष के रूप में पूरे भारत का जमकर अंग्रेजीकरण किया। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने बकायदा योजना बनाई और पुस्तिका जारी करके नीतिगत संदेश के माध्यम से कहा गया कि, भूल जाइए कि अंग्रेजी औपनिवेशिक
भाषा है। अंग्रेजी से ही देश के विकास का रास्ता प्रशस्त होगा और इस तरह गाँव-गाँव तक अंग्रेजी को पहुंचा दिया गया।
लगभग ३० वर्ष से देख रहा हूँ कि, जब भी हिंदी की बात आती है कांग्रेस के नेता हिंदी के खिलाफ अपनी दक्षिण के नेताओं को हमले करने के लिए छोड़ देते हैं और उत्तर भारत के नेता चुप्पी साध कर बैठ जाते हैं। आलाकमान कानों में रूई ठूंस लेती हैं। मौन स्वीकृति लक्षणम। भारतीय भाषाओं पर होने वाले प्रहारों पर सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक चुप्पी तो कथित लोहिया के अनुयायी और समाजवादियों की है। अपने को डॉ. राम मनोहर लोहिया के वारिस मानने वाले कथित समाजवादी नेता लालू और मुलायम जो पहले कभी हिंदी के पक्ष में खड़े होते थे, अब उनके वंशज हिंदी और भारतीय भाषाओं का नाम तक नहीं लेते। सत्ता पकड़ने के लिए कांग्रेस जैसे दलों से हाथ मिलाने के लिए वे अब अंग्रेजी के पक्ष में चुप्पी साधे दिखते हैं। सोचने की बात है कि उत्तर प्रदेश में बैठे अखिलेश यादव, लालू यादव और उनके पुत्र बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, जिनकी राजनीतिक जमीन हिंदी भाषी क्षेत्र है, उऩ्हें तमिलनाडु के स्टालिन और पी. चिदंबरम के राजनीतिक हिंदी विरोध का जवाब क्यों नहीं देना चाहिए ?
यह तो संभव नहीं है कि, कांग्रेस आलाकमान के इशारे के बिना दक्षिण के नेता, चाहे पी. चिदंबरम हों या शशि थरूर, जिनका अपने क्षेत्र में भी कोई विशेष जनाधार नहीं है, वे हिंदी के खिलाफ ज़हर उगल सकें। राहुल गांधी कथित रूप से ‘भारत जोड़ो यात्रा’ कर रहे हैं और उधर चिदंबरम जैसों को भाषा के नाम पर ज़हर फैलाकर भारत तोड़ने के लिए छोड़ रखा है। इस पर चुप्पी एक तरह से स्वीकार्यता हो या कातरता, दोनों ही राष्ट्र हित में नहीं। अगर ये बोथरे क्षेत्रीय क्षत्रप अपने राज्यों में अपनी भाषाओं को आगे बढ़ाने की बात करते तो हम भी उनकी आवाज में आवाज मिलाते, लेकिन इनके सुर बता रहे हैं कि, ये अपनी भाषा के पक्ष में नहीं, बल्कि परोक्ष रूप से हिंदी विरोध और अंग्रेजी के पक्ष में खड़े हैं। हिंदी पर इस प्रकार के अनावश्यक हमलों पर बेचारगी जाहिर करने से बेहतर है कि, इस संबंध में देश के लोगों को आपस में लड़वाने वालों को उनकी ही भाषा में जवाब दिया जाए। जब किसी राष्ट्रीय दल के नेता बार-बार हमारी भाषाओं पर हमला करवा रहे हैं, भाषा के नाम पर लोगों को लड़वाने की कोशिश कर रहे हैं तो निश्चय ही यह आलाकमान का राजनीतिक खेल है। हमें वहीं चोट करनी होगी।
अगर हम हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के समर्थन में हैं, तो हमें भारतीय भाषाओं और हिंदी के विरोधी कांग्रेस जैसे दलों को मत क्यों देना चाहिए ?
कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट रूप से समझ में आ जाना चाहिए कि, यदि वे हिंदी का विरोध करेंगे तो हिंदीभाषी देश के हर कोने में उसका विरोध करेंगे। नेताओं को मत बैंक के अलावा कोई दूसरी बात समझ नहीं आती। इन्हें इनकी भाषा में ही समझाना पड़ेगा। मत भूलिए कि दक्षिण में भी उत्तर भारतीयों की संख्या इतनी तो है ही कि, वह किसी के भी चुनावी समीकरण बिगाड़ दें। महर्षि दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, सरदार पटेल और मोदी तथा अमित शाह की भूमि पर गुजरात चुनाव के ठीक पहले भी हिंदू और हिंदी पर हमला आत्मघाती ही होगा।

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