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दायित्व बोध होना चाहिए गुरु को

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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यदि आप नहीं होते तो…(शिक्षक दिवस विशेष)…

‘गुरु’ शब्द अपने आप में एक पूर्ण शब्द है जो मानवता के कल्याण एवं उत्थान के लिए एक सर्वोपरि दायित्व है। भारतीय शिक्षा जगत में जहां गुरु पद की महिमा को विभिन्न उपाधियों से अलंकृत किया गया है, वहीं अंतरराष्ट्रीय फलक पर भी गुरु के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। प्राचीनतम इतिहास में यदि हम देखें तो गुरु अध्यात्म विद्या से संबंधित ज्ञान को देने वाले एक विशिष्ट धर्मात्मा को कहा जाता था, लेकिन कालांतर में व्यवस्था बदलती गई और गुरु का वह स्थान वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शिक्षक ने ले लिया है, जिसे आमतौर पर अध्यापक भी कहा जाता है।यह भी एक पूर्ण सत्य है कि, पुरातन समय में गुरु गुरुकुल व्यवस्था को संचालित करता था और वह उस कार्य के लिए किसी राज्य सरकार से कोई वेतन विशेष नहीं बल्कि, अनुग्रहित अंशदान प्राप्त जरूर करता था। गुरुकुल शिक्षा प्रणाली जहां सामाजिक निर्माण के साथ-साथ मानसिक निर्माण का बीड़ा उठाती थी, वहीं वह अध्यात्म विद्या के साथ-साथ चित्रण निर्माण का बोध कराने वाली शिक्षा का भी प्रावधान करती थी। मानसिक, बौद्धिक, काल्पनिक, आध्यात्मिक, चारित्रिक और राष्ट्र निर्माण के साथ-साथ आत्मा सुरक्षा और राष्ट्र सुरक्षा के भावों से ओत-प्रोत शिक्षा प्रणाल निरंतर भारतवर्ष में दी जाती रही।
यहां इस बात को स्पष्ट करना अति आवश्यक है कि इस प्रणाली में गुरु का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव था, वह अपने-आपमें महत्वपूर्ण था। मानव के भीतर मानवता, इंसान के भीतर इंसानियत, हुक्मारान के भीतर हुकूमत और आवाम के भीतर राज भक्ति और राष्ट्रभक्ति की भावना अगर कोई भरता था, तो वह गुरु ही होता था। इन सभी गुणों के साथ साथ अध्यात्म का परम लक्ष्य युक्त भावबोध अपने शिष्यों के अंदर जागृत करना इन गुरुओं का परम कर्तव्य और दायित्व होता था। इस दायित्व का निर्वहन करने के लिए ये गुरु लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते थे। शायद यही वह कारण था जिस कारण समाज इन्हें आदर की दृष्टि से पूर्ण सम्मान के साथ देखता था।
वर्तमान समाज में भारतीय शिक्षा प्रणाली में जो मैकाले शिक्षा पद्धति चली, उसमें गुरुकुल व्यवस्था को समाप्त कर उसके स्थान पर विद्यालय शिक्षा प्रणाली को लागू किया गया। शालाओं में अध्यापक प्रतिनियुक्त किए गए। इससे धीरे-धीरे पद की मर्यादा और गरिमा क्षीण होती गई। इसके पीछे अध्यापकों का वेतन भोगी होना भी एक कारण हो सकता है, और उसके साथ समाज का पाश्चात्य शैक्षिक रवैया भी एक कारण हो सकता है।
इस सत्य को किसी भी तरह से नहीं चलाया जा सकता कि मनुष्य के जीवन में गुरु के बिना गुणों का प्रादुर्भाव संभव ही नहीं है। यही वह कारण है जिसके चलते भारतीय संस्कृति में माँ को प्रथम गुरु का दर्जा दिया गया और उसके पश्चात तो निरंतर हमारे जीवन में कई गुरु विभिन्न क्षेत्रों में हमारा मार्गदर्शन करती हैं। इस बात का स्पष्ट उदाहरण भारतीय पौराणिक आख्यानों में दत्तात्रेय के जीवन चरित्र से हमारे सामने आता है। गुरु के प्रति श्रद्धा, विनम्रता और सहजता ही इन गुणों को ग्रहण करने का एक मुख्य माध्यम होता है, परंतु बड़े खेद की बात है कि आज के वर्तमान समाज में इन्हीं सबका ही मनुष्य में पतन होता जा रहा है।
गुरु शब्द का एक अर्थ बड़ा भी होता है। अर्थात अपने घर-परिवार और समाज के बड़ों के प्रति आदर, सम्मान और विश्वास रखना ही हम सब लोगों का दायित्व बनता है। और वयही दायित्व एक सद चरित्र व संतुलित-पुष्ट समाज का निर्माण करता है ।
विडंबना यह है कि आज अपने बड़ों के प्रति तो श्रद्धा भाग घटता ही जा रहा है, परंतु जो शिक्षक हमारी तोतली आवाज को सुधार कर एक पहलवानी का रूप प्रदान करता है, समाज को दशा और दिशा देता है, छोटे से लेकर बड़े तक के मानस पटल को निखार कर उसे देश और समाज का संचालन करने के लिए योग्य बनाता है, उसी गुरु के प्रति निरंतर श्रद्धा भाग घटता जा रहा है। शायद यही वह कारण है कि आज समाज में अनायास मानवीय घटनाएं हो रही है। अप्रिय वातावरण बढ़ता जा रहा है, चरित्र हीनता बढ़ती जा रही है एवं भ्रष्टाचार और लूट-घसीट भी बढ़ती जा रही है।
यह कतई नहीं कहता किसके लिए पूरी तरह से समाज ही जिम्मेवार है। यह भी नहीं कहता कि इसके लिए पूरी तरह राजनेता और सरकारें ही जिम्मेवार है। हाँ, इतना जरूर कहना चाहूंगा जो सरकार सत्ता में रह कर शिक्षकों के मान-सम्मान के प्रति इस समाज को जागृत करने का काम करेगी, शिक्षक वर्गों को चरित्रवान समाज के निर्माण के लिए प्रोत्साहित करेगी तथा शिक्षा प्रणाली में वह वातावरण तैयार करेगी, वही सरकार वास्तव में अपने दायित्व का पालन करने वाली राजनीतिक शक्ति कह लाएगी तथा इतिहास के पन्नों में अपना नया अध्याय अंकित करेगी |
ठीक इसी तरह समाज को भी अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिए गुरु की मर्यादा का सम्मान करने वाले भावबोध को पुनः अपने भीतर जागृत करना होगा। सेवा ,सत्कार और सत्संग जैसे महत्वपूर्ण गुणों को अपने भीतर पुनः समाहित करना होगा, परंतु इस बात से भी भी गुरेज नहीं कि इसके लिए एक सदचरित्रवान गुरु का होना भी अनिवार्य है। आज के वर्तमान वातावरण में गुरु ने भी अपना चरित्र इस कारण से बिगाड़ दिया है, क्योंकि वह अपने-आपको एक शिक्षक मान बैठा है। मैकाले की जो मंशा थी, आज पूरे शिक्षक वर्ग को उस मंशा से बाहर निकलने की जरूरत है। भले ही हम वेतनभोगी हों, परंतु राष्ट्र निर्माण का दायित्व हमारे हाथों में होने के कारण आज हमें अपने दायित्व का भी बोध होना चाहिए। हमें पुनः अपने- आपको शिक्षा जगत में कुछ इस तरह से प्रतिस्थापित करना होगा कि सत्ता और समाज दोनों ही पूर्व की भांति हमारे पद चिन्हों का अनुसरण करें और हमारे अनुगामी बनें। हमें सेवा, साधना, सत्संग और सदचरित्र को पुनः महत्व देने की जरूरत है। यही गुण वह अपने शिष्यों में जब परिवर्तित करता है, तो समृद्ध समाज का निर्माण होता है। भारत की यही गुरु-शिष्य परंपरा भारत को विश्व गुरु के पद पर विराजमान कर सकती है।